जिस घर में सन्तों का पूजा हो
जिस घर में सन्तों का पूजा हो,
फूलों की महकती सुगन्धि हो
उस घर में खुशहाली आये,
जिस घर में संध्या यज्ञ हो-२।।० ।।
अन्तरा – यह यज्ञ तुम्हारा करम है,
यह वेद तुम्हारा है धरम ।।
जब तुम कोई भूल करते हो,
उससे ये धड़कता है धड़कन ।।
हर शुभ करम तुमको देखे,
कि तुम एक परिश्रमी हो ।।
उस घर में खुशहाली आये…।।१।
ये वेद है परम दयालु का,
यह यज्ञ है सारी दुनियाँ का,
यज्ञ कर्म से बड़ा कोई कर्म नहीं,
बिना यज्ञ कर्म से मुक्ति नाहीं,
यज्ञ ही सभी श्रेष्ठ कर्मों में,
ये वेद ही श्रेष्ठ सभी धर्मों में,
हम जैसे आर्यजनों की,
ये दुनियाँ तो ऋषि मुनियों की
ये दुनियां है ऋषि मुनियों की-२
जिस घर में सन्तों का पूजा हो,
फूलों की महकती सुगन्धि हो
उस घर में खुशहाली आये,
जिस घर में संध्या यज्ञ हो ।। २ ।।
वैदिक सत्संग में बैठकर,
सुनो वेद की अमृत वाणी ।
ना आये कभी तुम पे कोई,
अन्धविश्वास जैसी परेशानी ।।
रब खुशियों में रखे तुमको,
जिससे तुम्हारी उन्नति हो ।
उस घर में खुशहाली आये…।।३।।










