जिनको कहते हैं – अजर, अशोकी
जिनको कहते हैं – अजर, अशोकी
आश्रय है जिनके त्रिलोकी
न वो जन्मे – न वो मरे
अकाल पुरुष, अविनाशी
मैं उनके दरस की प्यासी
जिनका ऋषि-मुनि ध्यान करत हैं
योगी योगाभ्यासी
मैं उनके दरस की प्यासी
हाँ !! मैं उनके दरस की प्यासी
अचल अमूर्त और अनुपम
प्रभु है सर्व-अविनाशी
अछेद अभेद अखण्ड अपर है
अक्षर और अनादि
मैं उनके दरस की प्यासी
जिनका ऋषि-मुनि ध्यान करत हैं
योगी योगाभ्यासी
मैं उनके दरस की प्यासी
अतुल बल जो अटल राज
सृष्टि सकल है दासी
“अमीचन्द्र” जिनसे होते प्रकाशित
रवि शशि अग्नि प्रकाशी
मैं उनके दरस की प्यासी
जिनका ऋषि-मुनि ध्यान करत हैं
योगी योगाभ्यासी
मैं उनके दरस की प्यासी
हाँ !! मैं उनके दरस की प्यासी
रचनाकार :- भक्त श्री अमीचन्द जी मेहता
स्वर :- सुश्री गीता सेतिया जी
आविष्कर्त्ता अमर वेद का
लेश न जिसमें भेद छेद का
अचल अभूत अलौकिक अनुपम
परिभू घट-घट वासी
अतुल राज्य है जिसका जग पर
सकल सृष्टि है जिनके अन्दर










