जीवन व्यर्थ गँवाओ ना

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जीवन व्यर्थ गँवाओ ना

जीवन व्यर्थ गँवाओ ना
निशदिन पाप कमाओ ना

वाणी से तुम मीठा बोलो (1)
कडवे बोल, बोल ना छोड़ो (2)
मृदु वाणी सबको भाती है
कभी किसी का हृदय न तोड़ो
मान करे ना उसको भी
तुम कडवे बोल सुनाओ ना
निशदिन पाप कमाओ ना
जीवन व्यर्थ गँवाओ ना
निशदिन पाप कमाओ ना

यूँ तो आज की दुनिया में
वैसे ही सच्चा प्यार नहीं है
घर घर में दीवार खड़ी में
आपस में सत्कार नहीं है
…….. ….. प्यार नहीं है
प्रेम का दीप जला न सको तो
प्रेम का दीप बुझाओ ना
निशदिन पाप कमाओ ना
जीवन व्यर्थ गँवाओ ना
निशदिन पाप कमाओ ना

परोपकार के भाव सदा जो
मन मन्दिर में लाओगे
दु:ख द्वन्द्व मिट जायेंगे सब
मुक्ति पद पा जाओगे
जग सेवा है प्रभु की सेवा
सेवा से कतराओ ना
निशदिन पाप कमाओ ना
जीवन व्यर्थ गँवाओ ना
निशदिन पाप कमाओ ना