झूठ छोड़ दे, सत्य बोल रे ऋत में वास कर ले

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झूठ छोड़ दे, सत्य बोल रे ऋत में वास कर ले

झूठ छोड़ दे, सत्य बोल रे
ऋत में वास कर ले
ओ भोले !
ज्ञान कर्म में, यज्ञ घोल ले
और उपासना के, झूल-झूले
अघ-रिपु क्षारण, कर ही ले
पाप तो सुख ना दे
मधुरस आनन्द, ले ही ले
सुचरित जीवन जी ले
झूठ छोड़ दे, सत्य बोल रे
ऋत में वास कर ले
ओ भोले !

कल्याण सबका, मन में तू चाहे
क्यों ना यज्ञ की, राह अपनाए
है यज्ञ ही उत्तम
परमात्मा जिसका धाम है
जो हटाता पाप
यज्ञ आत्मा निष्काम है
पल-पल नियम प्रभु पालता
सृष्टि को उसमें ढ़ालता
हितकर मिली धरा-उर्वरा
झूठ छोड़ दे, सत्य बोल रे
ऋत में वास कर ले
ओ भोले !

पाप कुटिलता, गाठें लगाए
भावना यज्ञ की, सरलता लाए
ऋत ज्ञानी बन जा
ऋतगामी सदा महान् है
आचार सरलता
व्यवहार कुशलता प्राण है
ऋत का मनन, सत्याचरण
ज्ञानी-सुधी, करते यजन
तम को हटा, ऐ युवा आत्मा
झूठ छोड़ दे, सत्य बोल रे
ऋत में वास कर ले
ओ भोले !

फिर अंगिरा आत्मा बन जाए
आनन्दघन प्रभु से रस पाए
अङ्ग अङ्ग में जिसके
परमेश्वर विद्यमान है
मेधावी वही है


मधुरस ही जिसकी खान है
ज्ञानी बनो, प्रभु रस चखो
जीवन मिला, सार्थक करो
गाओ ऋचा, पाओ प्रभा
झूठ छोड़ दे, सत्य बोल रे
ऋत में वास कर ले


ओ भोले !
ज्ञान कर्म में, यज्ञ घोल ले
और उपासना के, झूल-झूले
अघ-रिपु क्षारण, कर ही ले
पाप तो सुख ना दे
मधुरस आनन्द, ले ही ले
सुचरित जीवन जी ले
झूठ छोड़ दे, सत्य बोल रे
ऋत में वास कर ले
ओ भोले !

रचनाकार व स्वर :- पूज्य श्री ललित मोहन साहनी जी – मुम्बई
*रचना दिनाँक :– *

राग :- शुद्ध सारंग
गायन समय दिन का द्वितीय प्रहर
ताल कहरवा ८ मात्रा

शीर्षक :- ज्ञानी ही यज्ञ के मुख्य धाम को जानते हैं
वैदिक मन्त्र८९८वां
*तर्ज :- *
839-0240

‌शब्दार्थ :-
श्रत = सृष्टि के नियम
अघ-रिपु = पाप के शत्रु
यज्ञात्मा = यज्ञ की आत्मा
धरा = पृथ्वी
ऋचा = स्तुति
अङ्गिरा = अंग अंग में रस भरने वाला
कुटिलता = टेढ़ापन
सुधी = बुद्धिमान
यजन = यज्ञ करना
खान = भोजन

प्रस्तुत भजन से सम्बन्धित पूज्य श्री ललित साहनी जी का सन्देश :– 👇👇

ज्ञानी ही यज्ञ के मुख्य धाम को जानते हैं

मनुष्यों को योग्य है कि सब मंगल कार्यों में अपने और पराए कल्याण के लिए यज्ञ द्वारा ईश्वर उपासना करें।
इससे सिद्ध होता है कि यज्ञ का मुख्य धाम प्रभु, परमात्मा है। प्रभु को कौन जान सकते हैं? इसका इस मंत्र में निरूपण है।
ऋतं शंसन्त:-
प्रभु भक्तों को सबसे पूर्व ऋतज्ञानी और ऋतगामी होना चाहिए। ऋत का एक अर्थ है सृष्टिनियम। जब मनुष्य सृष्टि नियम का मनन और चिन्तन करेगा तो स्वयं भी अपना आचरण सृष्टि नियम के अनुकूल बनाएगा। सृष्टि नियम के अध्ययन से उसे स्त्रष्टा और उसकी सर्वव्यापकता का भाग होगा तब वह पाप से हट जाएगा‌।वेद में कहा है:-ऋतस् धीतिर्वृजिनानि हन्ति।
ऋ०४.२३.८ ऋत का चिन्तन पापों का नाश करता है। पाप करने के लिए मनुष्य ऐसे स्थान की खोज करता है जहां उसे कोई ना देखे। जब भक्त भगवान की सर्वज्ञता ,सर्वदृष्टता और सर्वव्यापकता का भान करेगा, तब सर्वत्र भगवान को देखेगा, अत: उसे पाप करने के लिए एकान्त स्थान ना मिल सकेगा और इस प्रकार वह पाप से छूट जाएगा।
ऋत का ज्ञानी एवं ऋतगामी होने के साथ साधक को’ऋजु दीध्यान:’होना चाहिये। कुटिलता पाप की होती है। कुटिलता, टेढ़ेपन की गाठें पड़ती हैं, कुटिलता का त्याग करके सरलता का धारण और चिन्तन करना चाहिए। झूठ में पेच होते हैं सत्य में सीधापन होता है। इसलिए सत्य का आश्रय लेना चाहिए और सत्य ही बोलना चाहिए। यज्ञ के प्रधान धाम का मनन करने के अभिलाषी को ऋजु=सरल विचारों वाला होना चाहिए अर्थात् प्रभु प्यारों का दूसरा गुण है कुटिलता- त्याग, सरल विचार तथा सरल आचार व्यवहार। अज्ञानी और मूढ़जन भी सरल होते हैं। आजकल तो सरल मनुष्य का अर्थ है मूढ़ मनुष्य। जो मूढ़ होगा, वह ऋत का मनन कैसे करेगा? सरलता के साथ ज्ञान चाहिए। अतः वेद ने प्रभु भक्तों का एक विशेषण दिया है:-
दिवस्पुत्रास:
प्रकाश के पुत्र।
प्रभु भक्त प्रकाश के पुत्र हैं अर्थात् प्रभु भक्तों में तीसरी विशेषता यह होती है कि वह उल्लू के स्वभाववाले ना हों। जिस प्रकार पुत्र को पिता की सम्पत्ति पर मान होता है इसी प्रकार भक्तों को प्रकाश पर अर्थात् ज्ञान पर भगवान के इस विशिष्ट गुण पर मान होना चाहिए और वे अपने आप को–
असुरस्य वीरा:=प्राण प्रदाता अन्तर्यामी
वरुण भगवान के वीर समझें।

प्रभु प्रेमियों का चौथा गुण यह होता है कि वह अपने आप को भगवान का वीर सैनिक समझते हैं।
अर्थात् वे लोग अपने स्वामी के आदेश के प्रचारक होने चाहिए, प्रभु प्यारों के प्रभु की संतान के रक्षक होने चाहिए। जब मनुष्य अपने आप को ऋतअनुसारी
सरलाचारी ज्ञान आधार प्रभु आदेशकारी बना ले, तो उसके अंगिरा होने में संदेह ही क्या है? अर्थात् इन गुणों के होने पर यह पांचवीं विशेषता उनमें अपने आप ही आ जाती है।
अङ्गिर:
अङ्गिर: का अर्थ है– अंगी के रस वाला जीवात्मा का नाम अंगी है। आत्मा जब बहिर्मुखी वृत्ति वाला होता है, तब वह आंख,नाक, कान जीह्वा आदि इन्द्रियों द्वारा रस लेना चाहता है, उसे भोजन में स्वाद मिलता है, सुगन्धित, सुरभित पदार्थों में उसे सुख की प्रतीति होती है, उसे शब्द मीठे और प्यारे लगते हैं, उसे रूप में आकर्षण का भान होता है, नरम नरम गदेले उसे सुख देते हैं, इत्यादि अनेक प्रकार के पदार्थ उसकी इन्द्रियों के द्वारा उसे सुख सुविधा पहुंचा रहे होते हैं। उस समय बाहर के विषयों के साथ संबंध होने से बाहर ही के विषय में रत हो रहा होता है।
उसे प्रतीत होता है कि सारे विषय सुख के साधन है; किन्तु सूक्ष्मता से जब गुजरते हैं तब यह प्रतीत होता है कि बात ठीक नहीं, क्योंकि जो एक पदार्थ देवदत्त को सुख देता है,वही यज्ञदत्त के लिए दु:ख का कारण बन रहा है। अब यदि वह सुख का कारण है तो उसे दु:ख का हेतु भी मानना पड़ेगा। एक ही समय में किसी भी वस्तु में परस्पर विरोधी धर्म रह नहीं सकते, जैसे वही जल एक ही समय में ठंडा और गर्म नहीं हो सकता। काल भेद से यदि किसी पदार्थ में विरुद्ध धर्मों की सत्ता मानी जाए, तो निमित्य के कारण ऐसा मानना होगा। जैसे जल साधारणतया शीतल होता है किन्तु अग्नि संयोग रूप निमित्त को प्राप्त कर वह गर्म हो जाता है। इसी प्रकार पदार्थ में सुख या दुख में से कोई एक धर्म अवश्य नैमेत्तिक है, किसी दूसरे के संबंध से।
इस बात को दूसरी तरफ भी समझा जा सकता है। मिश्री सबको मीठी लगती है वही दूसरे समय में उसी को बुरी लगती है। इससे भी प्रतीत होता है कि बाह्य पदार्थों में जो सुख का भान होता है वह उनका स्वाभाविक धर्म नहीं नैमित्तिक है।
इस बात को यूं लीजिए एक मनुष्य को आम बहुत प्रिय लगते हैं वह खूब खाता है उससे उसे रक्त्तातिसार लग जाता है; अब उसे आमों से घृणा हो जाती है और अब वह किसी अन्य वस्तु में स्वाद खोजता है। इससे भी प्रतीत होता हैकि आम नितान्त एकांत सुख का कारण नहीं है। तनिक काम की अवस्थाओं का विचार कीजिए। कच्ची दशा में आम खट्टा होता है पक्का कर वह पकाया मीठा होता है। पकने के बाद गलने- सड़ने लगता है, तब उसे खाने को चित्त नहीं चाहता। आम का खट्टापन, मीठापन और गलितपन स्वाभाविक नहीं नैमित्तिक है। दृष्टांत से स्पष्ट प्रतीत होता है कि प्राकृतिक पदार्थों में जो सुख की प्रीतीति होती है वह उन पदार्थों का स्वाभाविक धर्म नहीं वरन् नैमित्तिक है। इस तत्व को जानकर आत्मा अन्दर की ओर झुकता है, उसे रस आने लगता है। यह रस आत्मा का अपना नहीं है। यदि यह रस आत्मा का निजी होता तो आत्मा उसकी खोज में बाहर के पदार्थों से टक्कर क्यों मारता? यह रस आत्मा के अन्दर व्यापक अंतरात्मा– परमात्मा का है। परमात्मा रसमय है, नहीं- नहीं, वरुण परमात्मा रस है। उपनिषद में कहा है:- रसों वै स:……..
परमात्मा सचमुच रस है, उस रस=आनन्दघन परमात्मा को प्राप्त कर के उपासक आनन्दी हो जाता है। इस रस को प्राप्त कर आत्मा अंगिरा कहाता है।
क्योंकि उस समय वह प्राप्तव्य परमात्मा रस को धारण कर रहा होता है इसलिए वेद ने उस अवस्था के संबंध में कहा–विप्रं पदमङ्गिरसो दधाना:।
अंगिरा की मेधावी पदवी को धारण करने वाले।
सचमुच बुद्धिमान मेधावी धारणावती बुद्धिवाला वही है जो इस अवस्था को प्राप्त कर लेता है अर्थात् जो अंगिरा नहीं बना रसों के रस परमात्मा का जिसने अंग अंग में रस नहीं लिया, वह मेधावी नहीं। मेधा=धारणावती बुद्धि की सत्ता उसमें कैसे मानी जाए, जिसकी बुद्धि ने उस परमरस को धारण नहीं किया?
जो अंगिरा की मेधावी पदवी को धार लेता है वह सचमुच परम पूज्य के धाम का मनन चिन्तन निरन्तर करता रहता है।
वैदिक भजन ८९८वां
🎧898वां वैदिक भजन🕉👏🏽