जरूरत परिवर्तन की है

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जरूरत परिवर्तन की है

जरूरत परिवर्तन की है
घड़ी आत्मिक चिन्तन की है।
पश्चिम की शिक्षा से दिशा
भूले जीवन की हैं॥ टेक ॥
लार्ड मेकाले यहां पर,
जख्म सीने में गया कर।
जाल इस तरह का फैंका
निकल पाये नहीं फंसकर॥
आई अंग्रेजी जब से,
भूल गये रहना अदब से।
सभ्यता मर्यादा की
किताबें छिन गई हम से॥
आदर्शों की जगह कहानी
पागलपन की है॥1॥

ये शिक्षा भोगवाद की,
जो चिंगारी है आग की।
ग्रस्त भोगों में हो गये
मिटि संस्कृति त्याग की॥
समझ लिया सब कुछ ही धन,
इसीलिए भ्रष्ट है जीवन।
पाप के खाकर अन्न को
कलुषित कर बैठे मन॥
समझा है उत्थान जिसे
यह डगर पतन की है।।2।।

जिस ओर को रूख है,
वहां महलों में भी दुख है।
राम को राज्य भी तजकर
मिला कुटिया में सुख है॥
किया नहीं आत्म निरिक्षण,
हमारा त्याग का दर्शन।
लक्ष मुक्ति का अन्तिम
मिले जब कटजां बंधन।।
भोगों में लिप्त होकर ना
कड़ी कटती बन्धन की है।।3।।

करो विद्वान समिक्षा,
हमें चाहिये यह शिक्षा।
हो जीवन सदाचार का
चरित्र की जिसमें परिक्षा॥
जो पाठ्य-क्रम है यहां पर,
युवक युवती जिसे पढ़कर।
भ्रष्ट होते जाते हैं
भयंकर रोग ये कैंसर॥

मर रहे जिन पर नींव सुदृढ़
इस राष्ट्र भवन की है।
गन्दे नाविल हाथों में,
पढ़े जाते रातों में।
रात कटती है जागकर
सैक्स की ही बातों में।।
जो शासन राय जान ले,
बात निष्पक्ष मान ले।
गुरुकुल प्रणाली की
अच्छाई को पहिचान ले॥
हल हो समस्या कर्मठ जो
ये आरक्षण की है।।