जाने के फाटक खुले हुए

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जाने के फाटक खुले हुए

जाने के फाटक खुले हुए,
और आने के बन्द रहते हैं।
इतना तो बता दो आज हमें,
क्या धर्म इसी को कहते हैं।।

जो दिन और रात कमाते हैं,
भर पेट कभी ना खाते हैं।
निठल्ले मौज उड़ाते हैं,
क्या कर्म इसी को कहते हैं।।1।।

जीवन में किसी को नहीं दहें,
जो दहें उन्हें कुछ नहीं कहें।
चुपके से जुल्मों सितम सहें,
क्या शर्म इसी को कहते है।।2।।

दुनिया में किसी का हो न सके,
कुछ आगे के लिये बो न सके।
दुखियों के दुःख में रो न सके,
क्या मर्म इसी को कहते हैं।। 3 ।।

उल्टे को सुल्टा समझें,
सुल्टे को उल्टा समझें।
जो प्रेमी को कुल्टा समझे,
बस भ्रम इसी को कहते हैं।।4।।

आप साक्ष्य हैं मेरे प्रभु व्रत
मेरा सदा रहे कायम
निज निश्चय पूरी द्धढ़ता से पूर्ण
करूँ प्रातः सांयम्
सदाचारा व्रत का करते है
जो धारण हैं देव वही
असदआचारण जो
करते हैं मानव दुखी सदेव वही