जान मेरी बन सोम-सरिता
जान मेरी बन सोम-सरिता
निर्मल नीरज सुसंस्कृत
पद पा ले सही
किरण तू बन जा
बन जा लहरिया
बन जा नभ की
निर्झर बरसी हुई बदली
जान मेरी बन सोम-सरिता
मनों की हिंसा बन गई चिन्ता
मन में घिरा संकोच
हृदय ना खुलते, ना ही बहते
कृपण हो गई सोच
राह आर्द्रता की रुक सी गई
भाई-भाई से रूठ गए हैं
मानवता भी लाज की मारी
झिझक गई
जान मेरी बन सोम-सरिता
एक नजर सांसारिक धन पर
दूजी उपास्य पर है
भक्त करें आवाहन प्रभु को
फिर भी लगा तो भय है
सुनके यदि प्रभु आ ही गए
तो पोटली पाप की धरा ही ना ले
रहेगी मन की आशाएँ
सब धरी की धरी
जान मेरी बन सोम-सरिता
ऐ मेरे मन!
शिशु बन कर चल
पिता के घर में रह ले
हो जा पवित्र
त्याग कठोरता
द्रवीभूत हो बह ले
भक्तिभाव में है उदारता
ना है कृपणता
विरज मनोरथ के अवसर तो
मिलेंगे कई
जान मेरी बन सोम-सरिता
प्रभु महेन्द्र संपत्तियों का घर है
महल है उसका ब्रह्माण्ड
मानव तेरा भी छोटा महल है ये
हृदय भी तो है महान
विश्वपति का वैभव
विश्व में बिखर गया है
विस्तृत दान से विश्व की जानें
हरख गईं
जान मेरी बन सोम-सरिता
जान मेरी तू निर्मल बन जा
बहा दे चहु दिसि सोम
खोल दे ग्रंथि तू संकोच की
बदल दे दृष्टिकोण
इन्द्र की आँखें तुझको निहारे
होंठ प्रेम के चूमें चाटें
देख के रश्मि-लहर-अहि
जान मेरी बन सोम-सरिता
निर्मल नीरज सुसंस्कृत
पद पा ले सही
किरण तू बन जा
बन जा लहरिया
बन जा नभ की
निर्झर बरसी हुई बदली
जान मेरी बन सोम-सरिता










