जमी से प्रभु आसमाँ तक, खज़ाने लुटाते रहोगे

0
9

जमी से प्रभु आसमाँ तक, खज़ाने लुटाते रहोगे

तर्ज: जम से हमें आसमाँ तक

जमी से प्रभु आसमाँ तक, खज़ाने लुटाते रहोगे
दयालु है दाता तू दानी,
तो भक्तों की सुध क्यूँ न लोंगे ॥ जमीं से…

ये चाँद और सूरज ये नदियाँ ये पर्वत,
कैसे हैं सुन्दर नज़ारे
ये धरती ये अम्बर जज़ीरे समन्दर
जगमग चमकते तारे
अनोखी अजब तेरी कुदरत
कब तक दिखाते रहोगे ? ॥ दयालु है…

ये जीवन जो पाया प्रसाद तेरा,
सुख आए दुःख चाहे आए
न तन भी किसी का, न धन भी किसी का
तो अधिकार क्यूँ हम जताएँ
बड़ी होगी दाता कृपा जो
ये बन्धन छुड़ाते रहोगे ॥ दयालु है…

लगी आस तेरी कि तुझको ही पाएँ,
जीवन को उन्नत बनाएँ
जो आज्ञा है तेरी उसी को ही मानें
मन सद्‌गुणों से सजाएँ
तेरे ओ३म् नाम का अमृत,
जो माँगे तो क्या तुम ना दोगे ? ॥ दयालु है…