जलचर में थलचर में नभचर में है

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जलचर में थलचर में नभचर में है

तर्ज – नमन उन शहीदों को जिसने रचाया ये संसार है। उसी को नमस्कार हर बार है।।

जलचर में थलचर में नभचर में है
तेरी रसभरी रसना के स्वर में है
भूखों को भोजन खिलाता है
वो प्यासों को पानी पिलाता है
वो ‘सारंग’ सभी का ही भरतार है

सुहानी पवन जो चली जा रही है
उसी की खुदायी को ये गा रही है
सहारा सभी का है वो मेहरबाँ
वो ही गोड़ ईश्वर वो ही है
खुदा वो दाता दयालु सर्वाधार है
उसी को नमस्कार………

तूफान आँधी चलाता है
वो नदियों को निसदिन बहाता है
वो किसी डाल पर तो लगे शूल है
किसी डाल पर ख़िल रहे फूल है.
ये रचना रचाता वो करतार है
उसी को नमस्कार……

ख़िली है ये कलियाँ हज़ारों
चमन में हँसती महकती है
वन-उपवन में हर एक ड़ाल में
वो समाया विभु नज़र हर कली पे
वो रखता प्रभु उसी की तो रचना
ये गुल-ख़ार है उसी को नमस्कार……