जैसा दयानन्द था दया का फरिश्ता

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जैसा दयानन्द था दया का फरिश्ता

जैसा दयानन्द था दया का फरिश्ता,
कोई धरती के ऊपर ना आया।
आपने देखा हो तो बतादो,
उसके कदमों का चूमूं में साया॥ टेक ॥

हमने देखा नहीं पर सुना है,
उसकी हर बात तर्जे बयां थी।
मुखड़ा था चाँद जैसा मुनव्वर,
उसकी आदत फितरत भी क्या थी॥
मानों कुदरत भी उस पर फिदा थी,
सदके पैगाम वेदों का लाया ॥1॥

बेवा आसूं बहाती थी लाखों,
उनको जीने की उसने सलाह दी।
कोठों पर जाने से उनको रोका,
मांग उनकी दोबारा सजादी॥
उनके दिल ने उसे फिर दुआ दी,
जिनको फिर से सुहागन बनाया ॥2॥

तीर्थों मन्दिरों में गया वो,
पापों से पापी ना डर रहे थे।
देखा छुप-छुप के महन्त पुजारी,
रमणियों में रमण कर रहे थे॥
लूटकर झोलियाँ भर रहे थे,
उनका पाखण्ड जग को बताया ॥३॥

उसका दिल साफ था ज्यूं नगीना,
जर हसीनों पै पिघला कभी ना।
उसको आजमाके दुनिया ने देखा,
रंगों सूरत पै फिसला कभी ना॥
डूबने को था जब ये सफीना,
उसने बनकर के मल्लाह बचाया ॥4॥

शंकर सुकरात मीरा को एक बार,
जहर पीने को जग ने दिया था।
लेकिन दयानन्द ने तो कई बार,
जहर अपनों के हाथों पिया था॥
मौत ने उसको सिजदा किया था,
जाने से पहले खुद को सजाया ॥5॥

जहाँ पै सारे ही कंकर थे शंकर,
सच के कहने से क्या था रुका वो।
साधु था पर गदा वो नहीं था,
शाहों के आगे भी ना झुका वो॥
आया था आके भी जा चुका वो,
जीते दुनिया ने कितना सताया॥6॥

निकला गुजरात (अजमेर) से आके,
सारी दुनिया से उसने विदा ली।
तेरी इच्छा हो पूर्ण ईश्वर,
ये कहकर किया पिंजरा खाली॥
उन चिरागों से रोशन दिवाली,
जिन चिरागों को उसने जलाया ॥7॥

जिसने देखा हो हमको बता दो ,
था सूरत से कैसा दयानन्द ।
कोई अब तक तो कर्मठ मिला ना,
जो यह कहदे था ऐसा दयानन्द॥
अपने जैसा था खुद ही दयानन्द,
दूसरा कोई हमको ना पाया ।।8।।