जगतपति ने जगत् रचाया
(तर्ज- जुत्ती कसूरी पैरों न पूरी हाये रबा वे मैनू टुरना पया)
जगतपति ने जगत रचाया अन्त किसी ने भी पाया नहीं।
ऋषि मुनियों ने सब समझाया फिर भी समझ में आया नहीं।
जगतपति ने जगत रचाया……..
१. प्रभु निकट से भी निकट है दूर से भी दूर है।
सबके अन्दर सबके बाहर परमपिता का नूर है।
जन्म मरण से सदा रहित है उसकी कहीं कोई काया नहीं।
जगतपति ने जगत रचाय………..
२. अरबों ख़रबों चाँद सितारे नील गगन में घूमते।
अपनी अपनी चाल में चलते मचल मचल के झूमते ।
इक दूजे से आज तलक भी कोई कभी टकराया नहीं।
जगतपति ने जगत रचाया………
३. इस दुनियाँ का जीवन मेला चार दिनों का मेल है।
सब से मिलना और बिछुड़ना कुदरत का यह खेल है।
आ करके जो फिर न गया हो कोई कहीं मिल पाया नहीं।
जगतपति ने जगत रचाया……..
४. प्रभु से बढ़कर हो या बराबर और बताओ कौन है।
उसकी ताकत कोई न जाने सारा ज़माना मौन है।
‘पथिक’ भला क्या स्वाद बताये जिसने कभी गुड़ खाया नहीं।
जगतपति ने जगत रचाया………..










