जब तक खुद ना तू आर्य बना
जब तक खुद ना तू आर्य बना
वैदिक-शिक्षा पर यदि ना चला
तब तक कहलाएगा
आर्य ना तू सन्सार में
जब तक चारदीवारी में रहे चिन्तन-शक्ति
रह जाए चिन्तन-शक्ति धरी की धरी
कुएँ के मेंढक जैसी रह जाएगी दशा
मतावलम्बी के जैसी दशा
जो भी वेदों के पथ पे चला
किया दीन-असहायों का भी भला
वह रखता हर जातियों को अपने प्यार में
हर जातियों को प्यार में
वेद ने कहा कि भूमि
शान्ति के हेतु दे दी आर्य को
जीवमात्र का सुख-दु:ख
अपना समझ के करे कार्य को
सत्कर्मी से रखे ना भेद
अदानी-कृपण का करे उच्छेद
और दस्यु-अनार्य
ना आए उसके व्यवहार में
परम ऐश्वर्यशाली इन्द्र को कहते
जो अन्त:बाह्य शत्रु आत्मबल से जीतते
सुख शान्ति का विस्तार
आर्यजन ही करते
सन्सार को अपना कुटुम्ब समझते
घृणा करें पाप से, ना पापी से
होते ब्राह्मण उच्च कोटि के
है इन्द्र बलशाली
रक्षा करे नर-नार की
धन वैभव में रहता इन्द्र ऊंचे दान से
अराति नहीं है इन्द्र
रहता है निष्काम से
वसुधन पाकर बने उदार
गिरते-पड़तों का करें उद्धार
और बाँट के खाए
आर्य वही है सन्सार में
जब तक खुद ना तू आर्य बना
वैदिक-शिक्षा पर यदि ना चला
तब तक कहलाएगा
आर्य ना तू सन्सार में










