जब तक जग में शुभ कर्मों का संचित सामान नहीं होगा ।
जब तक जग में शुभ कर्मों का संचित सामान नहीं होगा ।
तब तक भव पार उतरने कापूरा अरमान नहीं होगा।
जब तक जग में शुभ कर्मो का संचित सामान नहीं होगा।
1.अच्छे व बुरे सब कर्मों से जाने पहचाने जाएंगे।
जग में है कौन भला ऐसा जिसका इन्तिहान नहीं होगा।।
जब तक जग में शुभ कर्मो का संचित सामान नहीं होगा।
2.दुनिया में लाख हवन सन्ध्या पूजा और पाठ करे कोई।
जीवन में शुद्धाचरण बिना हरगिज कल्याण नहीं होगा।।
जब तक जग में शुभ कर्मो का संचित सामान नहीं होगा।
3.जीवन की सुन्दर खेती में जो बोवोगे सो काटोगे।
मिरची का बीज अगर बोया बदले में धान नहीं होगा।।
जब तक जग में शुभ कर्मो का संचित सामान नहीं होगा।
4.दर्शन उस विश्व विधाता के होंगे तो किसी दिल में होंगे।
मन्दिर मस्जिद गुरुद्वारे में बैठा भगवान नहीं होगा।।
जब तक जग में शुभ कर्मो का संचित सामान नहीं होगा।
5.करने का समय है यही प्यारे कर ले कुछ नेक कमाई तू।
वरना फिर मानव जीवन का मिलना आसान नहीं होगा।।
जब तक जग में शुभ कर्मो का संचित सामान नहीं होगा।
6.बिल्ली को देख कबूतर तो कर लेगा आँखें बन्द पथिक।
तू तो इनसान कहाता है इतना नादान नहीं होगा।।
जब तक जग में शुभ कर्मो का संचित सामान नहीं होगा।
तब तक भव पार उतरने का पूरा अरमान नहीं होगा।।
जब तक जग में शुभ कर्मो का संचित सामान नहीं होगा।
स्वर एवं रचना – सत्यपाल पथिक (वैदिक भजनोपदेशक)










