जब दुर्गावती रण में निकली

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जब दुर्गावती रण में निकली

जब दुर्गावती रण में निकली,
हाथों में थीं तलवारें दो।
कट-२ के गिरी दुश्मन की सिफह,
जिस तरफ गई तलवारें दो ।।

जिस ओर गई बिजली की तरह,
बस समा प्रलय का बाँध दिया।
धरती काँपी आकाश हिला,
जब हिलने लगीं तलवारें दो।।१

गुस्से से चेहरा लाल हुआ,
आँखों से शरारे उठते थे।
धोड़े की बागें दातों में
हाथों में लीं तलवारें दो ।।२।।

लो बिखर गई एक शेरनी है,
हर उजू बदन का फड़क उठा।
उत चोट पड़ी नक्कारे पर,
इत निकल गई तलवारें दो।।३।।

हर हाथ पयामे मौत बना,
हर बार बहाना मौत का था।
सर धड़ से उड़े गाजर की तरह,
जब क्रोध गया तलवारें दो।।४।।

लाशों से धरती पटने लगी
और खून के दरिया बह निकले।
उस तरफ ही हाहाकार मची,
जिस तरफ चली तलवारें दो।।५।।

दुश्मन के छक्के छूट गये
सब जोम मलेच्छी टूट गये।
पग सर पर रखकर भाग चले
जग रूक न सकीं तलवारें दो।।६।।

दुर्गा भारत की शान थी तू,
हिन्दुओं के पत की आन थी तू।
दुश्मन की याद अभी तक है,
वे खून भरी तलावारें दो।।७।।