जब देव दयानन्द आया
जब देव दयानन्द आया
अन्धकार यहां था छाया
भटक रहे थे भारतवासी,
सत्य मार्ग दिखलाया रे…।।
फैल चुकी थी घोर अविद्या,
वेद नजर से दूर हुआ जुल्मों
सितम और दुर्व्यसनों से,
देश मेरा भरपूर हुआ।
सोये हुओं की आंख खुली,
जब वेद की बीन बजायी रे।।
कहीं मुसलमान कहीं ईसाई,
जाल बिछा कर बैठे थे।
फंसे हुए चिड़ियों की तरह,
हम शीश झुकाये बैठे थे तोड़
दिये भ्रम जाल ऋषि ने,
हमें आजाद कराया रे….।।
ऋषि ने तो इस देश पे अपना
तन-मन-धन सब वार दिया
हमने उसे बदले में जहर,
एक बार नहीं कई बार दिया।
हँस-हँस पी गये जहर के प्याले,
अमृत हमें पिलाया रे…।।
चोर-उचक्के बने चौधरी,
सत्यधर्मी थे मौन यहां
ऋषि दयानन्द न आते तो
हमें बचाता कौन यहां।
वेद धर्म का पथिक रखवाला
आर्य समाज बनाया रे…।।










