इससे अच्छा और जहां कहां खोजने जाऊं मैं।

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इससे अच्छा और जहां कहां खोजने जाऊं मैं।

इससे अच्छा और जहां
कहां खोजने जाऊं मैं।
गली-गली डगर डगर
पर साथ तेरा पाऊं मैं।
अंसुवन जल सींच सींच
तुझे मन में उपजाऊ मैं।
इससे अच्छा और जहां
और कहां पर पाऊं मैं।

वेद की रिचाऐं देख,
उपनिषद की वाणी देख,
भरा भंडार है ज्ञान का,
और क्या क्या पाऊं मैं।
इससे अच्छा और ज्ञान
कहां खोजनें जाऊं मैं।

वीरों की यह जननी है
जन्मों की यह तरणी है।
ऋषि मुनियों के ज्ञान को
कहां किस जगह पर ध्याऊं में
वीरों की भूमि पर मैं
वीर गति पा जाऊं मैं।
स्वर्ग सी इस धरा को
छोड़ कर कहां जाऊं मैं।

यही स्वर्ग है मेरा
यहीं पर कर्म है मेरे
पाकर इस कर्म कर्ज को
कहां चुकाने जाऊं मैं।
इस धरा के सिवा,
किसी और धरा पर क्या धरा।
धर इसकी माटी को,
चन्दन समझ लगाऊं मैं।
इस स्वर्ग को छोड़कर,
कोई और धरा न पाऊं मैं।

जनम ले इस भूमि पर
धर्म को इसी का जी।
अन्न खाकर देह को,
गृहण जल इसी का पी।
धर ध्यान धरा धर्म का,
किसे चुकाने जाऊं मैं।
सब-कुछ धरा है इस धरा पर,
और किस धरा का गुण गाऊं मैं।
इसी धरा के लिए जीऊंगा मैं
इसी के धर्म पर मर जाऊं मैं।
इस माटी के कर्ज को,
कभी चुका न पाऊंगा मैं,
कभी भूल न पाऊंगा।