इस योग्य हम कहाँ है प्रभुवर तुम्हें मनाये

0
44

इस योग्य हम कहाँ है प्रभुवर तुम्हें मनाये

इस योग्य हम कहाँ है प्रभुवर तुम्हें मनाये
फिर भी मना रहे हैं शायद तू मान जाए।

१. जग में जहां भी देखा बस एक ही चलन है।
एक दूसरे के सुख में खुद को बड़ी जलन है।
कर्मों का लेखा जोखा कोई समझ न पाए।।

२. जब से जन्म लिया है, विषयों ने हमको घेरा।
छल और कपट ने डाला,इस भोले मन में डेरा।
सद्बुद्धियों को हमने हर दम रखा दबाये।।

३. निश्चय ही हम पथिक है लोभी हैं स्वार्थी हैं।
तेरा नाम जब भी ध्याये माया पुकारती है।
सुख भोगने की इच्छा हम क्यों दबा न पाए।

४.जब कुछ न कर सके तो तेरी शरण में आये
अपराध मानते हैं झेलेंगे सब सजाएं।
अब ज्ञान हमको दे दो , कुछ और हम न चाहें।

इस योग्य हम कहाँ है, प्रभुवर तुम्हें मनाये।
फिर भी मना रहे हैं,शायद तू मान जाए।