इस घर के प्रहरी निद्रा में गहरी,सोये रे।(धुन- कोई शहरी बाबु)
इस घर के प्रहरी निद्रा में गहरी,
सोये रे।
अब कौन जगाये इनको,
जगाते हार गये।।
हम बोले मचे रोले
वह आंख भी ना खोले।
बोलो ऐसे में हम क्या करें,
जगाते हार गये।। टेक ।।
टूटे जंगले कुन्दे ताले,
बैठे देख रहे घरवाले।
बेदर्दी से लूट मची है,
घर के भेदी डाका डालें ।।
बहुमूल्य राशि लूटी
जा चुकी है खासी।
बोलो ऐसे में हम क्या करें,
जगाते हार गये।।1।।
आज हमारे लाल और ललना,
झूल रहे गैरों के पलना।
अपने पराये की सुधि भूले
बड़ा ही कठिन है आज सम्भलना,
हम अपनाये, वह छुरियां चलायें,
बोलो ऐसे में हम क्या करें
जगाते हार गये।।2।।
श्रद्धा सत्य विश्वास लूटा है,
संस्कृति इतिहास लुटा है।
क्या-क्या गिनायें लुट गया
सबकुछ जो था हमारे पास
लुटा हैं ‘प्रेमी’ समझाये
कोई समझ न पाये बोलो ऐसे में हम……..










