इन्द्र के महल को

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अपन्धन्पवते मृघोप सोमो अराव्णुः। गच्छन्निद्रस्य निष्कृतम्।।

साम. ५१०,१२१३ ऋ. ६.६१.२५

तर्जः मयनी पोई, न्यान मयनी पोई

जान मेरी, ऐ सोम सरि, निर्मल नीरज, पद पा ही गई
किरन बनी, तू लहर बनी, तू बनी बदली और बरस गई
इन्द्र की आँखें, देखें तुझको बन प्रभु-प्यारी, शिशु सी नई॥
जान मेरी…

सम्पत्तियों का घर है, ये विश्व महेन्द्र का है अतिदान,
सम्राटों, के सम्राट का, है सजा हुआ ये महल महान,
पर इन्द्र का, प्यारा पुत, गया भटक, खोज उसकी है अविराम ॥
जान मेरी…

खुलते नहीं, हृदय कई, कर्मों की कृपणता करे व्यवधान
भाई का, भाई शत्रु, भाषा-वाणी का नहीं है सम्मान
ना गले से वह गले मिलें, पिता-पुत्र के रिश्ते बने अनजान॥
जान मेरी…

संकोच है, है बाधा, भक्ति भाव की चाह ना उदारता
किमि पायें, परमेश्वर, कृपण भक्त ना जाने प्रभु-पात्रता
डर है उसे, गँवा न दे, भरी पाप की पोटली का सामान ॥
जान मेरी…

मेरे मन! चल शिशु बन, चल पिता के घर होवें पवमान
आर्द्र होने, बह जाने, ले विनयशीलता का आदान
बन बाढ़, आँसुओं की, छल खल मल का कर दे अवसान॥

(सरि) नदी। (नीरज) कमल। (अतिदान) अत्यन्तदान। (अविराम) निरन्तर। (कृपणता)
कंजूसी। (व्यवधान) रूकावट। (किमि) कैसे? किस प्रकार। (पवमान) अत्यन्त पवित्र।
(आई) भीगा हुआ। (आदान) ग्रहण। (अवसान्) समाप्ति।