इक ओ३म् नाम ही जप सदा
इक ओ३म् नाम ही जप सदा
निशदिन पाये सम्प्रसाद आत्मा
रही जीवों पर प्रभु की कृपा से
ना उससे कोई कभी जुदा
इक ओ३म् नाम ही जप सदा
विस्तृत हृदयाकाश में बैठा
पा रहा है ज्योतिर्मय प्रभा
प्रभु का मन्दिर इसमें सजा
शोभा प्रभु कि वह पा रहा
इक ओ३म् नाम ही जप सदा
ब्रह्मरूप महापुरुष मोहन का
आत्मा करे ब्रह्मामृत दोहन
मनोमय पुरुष है यह आत्मा
करे साक्षात्कार की कामना
इक ओ३म् नाम ही जप सदा
ऋत-सत्य-ज्ञान से बन तपी
तब ही तो पाएगा मुक्ति
सत्य ज्ञान कर्म है समृद्धि
पाएगा ज्योतिर्मय प्रभा
इक ओ३म् नाम ही जप सदा
सत्पुरुष बन उत्तम ज्ञानी
कर दे प्रसन्न हर इक प्राणी
सद्-ज्ञानामृत की कर वृष्टि
परहित ही चिन्तन हो तेरा
इक ओ३म् नाम ही जप सदा
निशदिन पाये सम्प्रसाद आत्मा
रही जीवों पर प्रभु की कृपा से
ना उससे कोई कभी जुदा
इक ओ३म् नाम ही जप सदा










