हृदय से जो चाहे प्राणी मात्र का भला।
हृदय से जो चाहे प्राणी मात्र का भला।
बस वही जानता है जीने की कला ।।
रूबाई
वह जीना क्या जीना
जिसमे जीने के अरमान नहीं,
अरमान नहीं अरमान कि
जिसमें तड़प नहीं तूफान नहीं।
तूफान नहीं तूफान कि
जिसकी ठोकर में निर्माण नहीं।।
निर्माण नहीं निर्माण जो
फूंके पत्थर में भी प्राण नहीं
कली
जीवन संघर्षों की बगिया
फूल भी इसमें कांटे भी,
यदि बहारें पलकें चूमें
पतझड़ मारे चांटे भी,
हलचल कलकल की
कोलाहल कभी शान्त सन्नाटे भी,
कभी मोद मंगल महोत्सव
कभी करूण कर्रहांटे भी।।
जीवन के हर मोड़ पर
जो सम्भल कर चला,
बस वही जानता है
जीने की कला । ।1।।
रूबाई
प्यार पतझार नहीं,
मौसमी बहार नहीं।
मन का यह सौदा है,
तन का व्यापार नहीं ।।
सोचता हूँ प्यार जग
की साधाना है। सोचता हूँ
आदमी की वासना हैं।।.
सोचलूँ कुछ भी
मगर मैं जानता हूँ।
सृष्टि की यह एक
चेतन कामना है।।2।।
प्रेरणा जिससे मिले वह प्यार है।
कल्पना जिसमें पले वह प्यार है।।
जिन्दगी के शुष्क रेगिस्तान में।
स्वाति बनकर जो ढ़ले वह प्यार है।।3।।
कली
जैसा गन्ध सुमन का नाता
और आँख का है जल से
ढ़ाई अक्षर प्यार का नाता
ऐसा ही है दो दिल से
रूबाई
प्यार परिचय को पहिचान बता देताहै।
प्यार वीरां को गुलिस्तान बना देता है।।
आप बीती कहता हूँ पराई नहीं।
प्यार आदमी को इन्सान बना देता है।।
कली
किंचित भी विचलित ना हो
जीवन पथ पर निज मंजिल से
दुर्गुण दुरित दूर करके दृढ़ता से
निकल हर मुश्किल से
कर अनकूल जो वातावरण के
सांचे में ढ़ला, बस वही जानता है
जीने की कला ।।2||
कली
हर अच्छाई अपने अन्दर
विकास के अंकूर रखती है,
हर बुराई अपने अन्दर
विनाश के अंकुर रखती है।
हर सच्चाई अपने अन्दर
साहस के अंकुर रखती है।
हर कटुलाई अपने अन्दर
त्रास के अंकुर रखती है।।
जो हित अनहित से परिचित,
नित्य फूला और फला,
बस वही जानता है
जीने की कला ।।3।।
रूबाई
जिन्दगी पथ है मंजिल
की तरफ जाने का,
जिन्दगी गीत है मस्ती
से सदा गाने का।
मौत आराम से सो
जाने की बदनामी है,
जिन्दगी नाम है तूफानों
से टकराने का।।
युं तो यहां हर आँच
बहुत रोती है,
हर बूंद मगर अश्क नहीं होती हैं।
जो देखकर रो दे जमाने का गम,
उस आँख से आंसू जो गिरे मोती है।।
है स्वार्थ का धन एक ऐसा धन,
जो निर्धन से छीना होता है।
त्याग के हर एक आंसू में,
सावन का महीना होता है।।
आलस्य में जीये अमृत भी पीये,
वह खून का पीना होता है।
मेहनत का पसीना जहाँ गिरता,
कंकड़ भी नगीना होता है।।
कली
धर्म का मर्म समझ करके
हर काम धर्म अनुसार करें,
प्राणी मात्र से प्रीति पूर्वक
यथा योग्य व्यवहार करें।
जीवन का उद्देश्य जान कर
जन जन का उद्धार करें,
कुशल खिवैया बन कर
नैया भव सागर से पार करें।।
प्रेमी पर उपकार मैं जो,
ललना और लला,
बस वही जानते हैं जीने की कला।।4।।
(मनुर्भव)
त्याग तपस्या से पवित्र परिपुष्ट हुआ
जिसका तन है
भद्र भावना भरा स्नेह संयुक्त
शुद्ध जिसका मन है
होता व्यय नित प्रति परहित में
जिसका शुचि संचित धन है
वही श्रेष्ठ सच्चा मानव है
धन्य उसी का जीवन है










