होते हुओं को जगाते हुए एक जमाना बीत गया। (धुन-अपना मुकद्दर बिगड़े हुए)
होते हुओं को जगाते हुए
एक जामना बीत गया।
रूठे हुओं को मनाते हुए
एक जामना बीत गया।। टेक ।।
गर्मी सर्दी बरसातों में भूखें
और प्यासे रहकर।
नंगे पैरों पैदल चलकर निश
दिन ग्राम नगर घर-धर।।
किस्से कहानी सुनाते हुए,
ठण्डा लहू गरमाते हुए,
एक जमाना बीत गया।।1।।
सभी रसों में करके कविता
दुनियाँ के प्रमाण दिये।
गा-गाकर आवाज थका
लई चीख-चीख व्याख्यान दिये ।।
जुल्मों से टकराते हुए जख्मों पै
मरहम लगाते हुए।।
एक जमाना बीत……….2||
किसी ने गाली किसी ने
गोली किसी ने मारे ईंट पत्थर।
किंचित भी विचलित न हुए
हम सहते रहेसब हंस-हसं कर ।।
चोटों पै चोटें खाते हुये गिरते
हुओं को उठाते हुए एक
जमाना बीत गया… ।।3।।
गैरतो अपने क्या होने थे
अपने भी नहीं अपने रहें।।
प्रेमी सारे अरमानों के आज
अधूरे सपने रहे। पत्थर पै
जोक लगाते हुये ख्यालों की
दुनिया बसाते हुये।।
एक जमाना बीत गया…….. ।।4।।










