हो रही धरा विकल,हो रहा गगन विकल।

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हो रही धरा विकल,हो रहा गगन विकल।

हो रही धरा विकल,
हो रहा गगन विकल।
इसलिए पड़ा निकल,
है आर्यों का वीरदल।

अज्ञान अन्धकार को,
अन्याय अत्याचार को।
मिटाएं जाति-पांति भेद-
भाव के विचार को।
साथ लिए सबको चल,
ऋषि ध्येय हो सफल इसलिए….।

असंख्य कीर्ति रश्मियाँ,
विकीर्ण तेरी राहों में।
सदैव से विजय रही है,
वीर तेरी बाहों में।
रुके कहीं न एक पल,
प्रवाह जोश का प्रबल-इसलिए….।

ऋचाएँ वेद की लिए,
सुगन्ध होम की लिए।
जिधर से हम पड़ें निकल,
जलें अनेक ही दिए।
सभी प्रकार से कुशल,
सभी प्रकार से सबल-इसलिए….।