हो हो हो ऽऽऽ चार दिनों की है कहानी रे
तर्ज – पंख होते तो उड़ आती रे……..
हो हो हो ऽऽऽ चार दिनों
की है कहानी रे
तुझको ना ये पता तेरी मिट जायेगी
निशानी रे हो हो हो ऽऽऽ
- काहें को चलता,
है तू अकड़ कर चलना होगा रे,
लाठी पकड़कर ना गुमान
कभी तू किया कर प्यार से
इस जग में जिया कर तुझको
ना ये पता, तेरी………..
2. है जो तेरे, अपने यहाँ पर ले चलेंगे,
वो ही वहाँ पर होगा रे श्मशान
ठिकाना ना चलेगा कोई बहाना
तुझको ना ये पता, तेरी………
ना यहाँ पे, है कोई तेरा है यहाँ तो,
रैन बसेरा छोड़कर जग
‘सचिन’ चलेगा ना पता कहाँ
जन्म मिलेगा तुझको ना ये पता,
तेरी……….









