हे सोम !

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हृद॒िस्पृश॑स्त आसते विश्व षु सोम् धार्मसु।

अधा कामा॑ इ॒मे मम॒ वि वो मदे॒ वि तिष्ठन्ते वसूयवो विव॑क्षसे।

। ऋः १०.२५.२

तर्जः मावन त्या दिनकरा

भक्त तेरा बन गया, सोम प्रभु!
भक्त तेरा बनता गया
॥भक्त तेरा॥

जान गया हूँ तेरे हृदय को छूने वाले भक्त अनन्य हैं (2)
सब स्थानों लोकों धामों में (2) भक्त भजन करें तेरा।
॥ भक्त तेरा॥

ना जानूँ निज भक्ति भाव लिये तेरा हृदय कभी छू भी सकूँगा (2)
परमार्थी निष्काम भक्ति का तो उतरे खरा॥
॥ भक्त तेरा॥

सच पूछो तो बिना समझे ही हृदय फँसा है इच्छाओं में। (2)
और महत्त्वाकांक्षाओं में ये मन बरबस अड़ा॥
॥ भक्त तेरा॥

मान प्रतिष्ठा सिद्धि रिद्धि की अभिलाषा जाग रही हैं (2)
आखिर तो हे सोम प्रभु मैं तुमसे मिलने खड़ा॥
॥भक्त तेरा॥

पूरी करके अभिलाषाएँ मेरे हृदय को हलका कर दो। (2)
जो पाऊँ सो आखिर तुझमें होगी समर्पित मया।
॥ भक्त तेरा ॥

माना के अर्थार्थी भक्ति दूर रही निष्काम भाव से (2)
हृदयहारी परमेश्वर तुम ही भरोगे मुझमें श्रद्धा॥
॥ भक्त तेरा॥

सब पूरित इच्छायें आकर तुझमें ही मिल जायें प्रभुवर (2)
तेरा हृदयस्पर्शी निष्काम भक्त बना मुझे सगा॥
॥ भक्त तेरा॥

(अनन्य) अभिन्न, अनुपम। (परमावी) गूढ़, सत्यवादी। (मया) स्नेह, प्यार। (अर्वार्थी) धन-अभिलाषी ।