हे प्यारे प्रभुजी ! सुन लो पुकार

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हे प्यारे प्रभुजी ! सुन लो पुकार

हे प्यारे प्रभुजी !
सुन लो पुकार
हे पालनकर्ता !
कर दो उद्धार
आगे बढ़ते, रहें आगे बढ़ते
कर दो मेधावी हमको
हे जीवन आधार
आगे बढ़ते, रहें आगे बढ़ते

तीनों ही प्रकार की
कष्ट विघ्न बाधाएँ
आधिदैविक आधिभौतिक
(और) आध्यात्मिक बाधाएँ
करता रहूँ मैं पार
ऐ प्यारे प्रभु जी !
सुन लो पुकार
हे पालनकर्ता !
कर दो उद्धार
आगे बढ़ते, रहें आगे बढ़ते

काम-क्रोध आदि से
कर लें हम यदि दूरी
अनसुनी ना होवेगी,
प्रभु (जी) प्रार्थना मेरी
तू है दीन-उद्धार
हे प्यारे प्रभु जी !
सुन लो पुकार
हे पालनकर्ता !
कर दो उद्धार
आगे बढ़ते, रहें आगे बढ़ते

मेरी प्रार्थना भगवन्
अनसुनी नहीं होगी
यदि बन गया ‘अत्रि’ प्रभुजी
और (मैं) विरूप
क्यों ना करोगे उद्धार?
हे प्यारे प्रभुजी !
सुन लो पुकार
हे पालनकर्ता !
कर दो उद्धार
आगे बढ़ते, रहें आगे बढ़ते

जनसेवक जननेता
और दीनों का सेवक
यदि हो गया प्रभुजी
(तब तो) सुन लोगे पुकार
हे प्यारे प्रभुजी !
सुन लो पुकार
हे पालनकर्ता !
कर दो उद्धार
आगे बढ़ते, रहें आगे बढ़ते

‘प्रसृकण्व’ की लाएँ
भव्य भावना तोरी
हे महान व्रतों के पालक !
अग्निमय प्रभुजी !
मुझको बल दो अपार
हे प्यारे प्रभुजी !
कर दो उद्धार
हे पालनकर्ता !
कर दो उद्धार
आगे बढ़ते, रहें आगे बढ़ते ‌
रहें आगे बढ़ते रहें आगे बढ़ते

ओ३म् प्रि॒य॒मे॒ध॒वद॑त्रि॒वज्जात॑वेदो विरूप॒वत् ।
अ॒ङ्गि॒र॒स्वन्म॑हिव्रत॒ प्रस्क॑ण्वस्य श्रुधी॒ हव॑म् ॥
ऋग्वेद 1/45/3

रचनाकार व स्वर :- पूज्य श्री ललित मोहन साहनी जी – मुम्बई