हे न्यायकारी नाव हमारी कर दे

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हे न्यायकारी नाव हमारी कर दे

हे न्यायकारी नाव हमारी कर दे
परली पार तीव्र है धार तिरंगी ।।
चप्पू बल्ली हाथ नहीं
जर-जर किस्ती मेरी है।
पास मेरे प्रकाश नहीं छा
रही निशा अँधेरी है।
जन्म-जन्म से सहते
आये तीन दुःखों की भार ॥ १ ॥

सत-रज और तम तीनों का
बड़ा भयंकर चक्कर है।
काम-क्रोध-मद-लोभ-मोह
की हर प्राणी से टक्कर है।
घटिकयन्त्रवत् घूम रहा है
यह सारा संसार ॥ २ ॥

विषय वासना की चक्की
पीस रही नर नारी को।
आशा पास में फँसे कैसे
त्यागे तृष्णा हत्यारी को।
रंग बिरंगे फूलों से है
सजा हुआ बाजार ॥ ३ ॥

इस संसार समुद्र में ग्राह
मगर मुँह फाड़ रहे।
शेर व भालू जंगल में
चारों और दहाड़ रहे।
कहे भीष्म हम विवश आप
बिन किससे करें पुकार ॥ ४ ॥