हे करुणाकर! हे भगवन्, सद्-बुद्धि वर्षक घन
हे करुणाकर ! हे भगवन् !
सद्-बुद्धि वर्षक घन
पाप-प्रवाह से हमें बचा लो
और दिखा दो अपनापन
हे करुणाकर ! हे भगवन् !
पाप-प्रवाह में आत्मा से इन्द्रियाँ
विद्रोही बन जाती हैं
आत्मा के वश ना वो रहती हैं
विचल विमुख हो जाती हैं
हे करुणाकर ! हे भगवन् !
घोर अन्धकारक आसुरी लोक में
मरकर पापी आते हैं
आत्मघाती को नए जन्मों में
पाप अन्धकार सताते हैं
हे करुणाकर ! हे भगवन् !
जागते जब सत्कर्म मनुष्य के
तब तुम मिलने आते हो
हे महाबल प्रियवर अग्ने !
सोये भाग्य जगाते हो
हे करुणाकर ! हे भगवन् !
घोर सन्नाटा रात्रि में छाए
ध्यान में आपके हो जाएँ
हमें अकेला भटका समझकर
आप मिलन में खो जाएँ
हे करुणाकर ! हे भगवन् !
नास्तिकता फिर कैसे रहेगी?
और मन में सन्देह कहाँ
प्रेम विनय श्रद्धा के समर्पित
सङ्ग खड़े हैं देव यहाँ
हे करुणाकर ! हे भगवन् !
अब ना अनास्था, ना ही अश्रद्धा
पङ्क, पाप का फिर है कहाँ ?
आने ना देना, फिर से अमति को
ना तुम्हें दूँ मैं गवाँ
हे करुणाकर ! हे भगवन् !
सद्-बुद्धि वर्षक घन
पाप-प्रवाह से हमें बचा लो
और दिखा दो अपनापन
हे करुणाकर ! हे भगवन् !










