हे अनन्त देव तू महान् से महान् है।

0
9

हे अनन्त देव तू महान् से महान् है।

हे अनन्त देव तू महान् से महान् है।
विश्व की हर एक चीज़ में विराजमान् है।….

तू असीम अज “अजर” अमर अनादि तत्त्व है।
अर्चनीय वन्दनीय अद्वितीय सत्व है।
सकल गुणनिधान अतुल सर्वशक्तिमान् है ।…

तेजमय आदित्यवर्ण अन्धकार से परे ।
दिव्य पुरुष दीन की समस्त दीनता हरे ।
प्राणवान् प्राणियों के प्राण का भी प्राण है।…….

निर्विकल्प निर्विकार नित्य निराकार तू।
सृष्टिकर्त्ता धर्त्ता हर्त्ता और सर्वाधार तू।
सत्य शुद्ध बुद्ध मुक्त ब्रह्म तत्त्व ज्ञान है।…

साधकों के ध्यान में उपासकों के गान में।
दया धर्म धारियों में दानियों के दान में।
‘पथिक’ भक्ति भावना में सहज विद्यमान् है ।..