हरि को हरि बनने दो

0
9

कन॑िक्रन्ति हरिरा सृज्यमानः सीद॒न्वन॑स्य जुठरै पुना॒नः ।

नृर्भिर्युतः कृणुते निर्णजूं गा अततो॑ म॒तीर्ज नयत स्व॒धार्भिः

।। साम. ५३० ऋ. ६.८५.१

तर्जः मिनी तानिज पुरिइरिक्युम मदयेनो

हरि भक्ति में मन को रमने दो
और हरि को हरि बनने दो
इस आत्मा को बहुविध बल दे दो।
पाप वृत्तियाँ दूर ढकेलो ।
मेरे संग हे हरि रहना तू तू
ही तू बून्द अमृत की पिला देना तू ही
संगी संगी संगी, सदा रहे प्रभु संगी, संगी संगी संगी,
॥ हरिभक्ति ॥

चित्त वृत्तियों में रंग अपना भर दो
आकर्षित इन्हें अपनी ओर कर दो
कर दो कर दो इनको कर दो
छूटे ना संग तेरा हृदय में घर कर लो
हृदयासन पर बैठो, दूर कुमार्ग से कर दो
गाऊँ सदा तेरे गीत, तान तरंगित करो
मन क्या करे तुझ बिन, शरण में लो मुझको
॥ हरिभक्ति ॥

धारणा ध्यान समाधि है संयम
किया चित्तचोर को आत्म-समर्पण
संयम संयम पूर्ण हो संयम
लोहा मैं तुम चुम्बक, भक्ति में मैं हूँ नीरत
मन स्थित प्रज्ञ है अवरत, हरि-दर्शन हुए अवतस
मन मोहक तान सुन, सुध-बुध हो गई गुम
डूबा हरि ध्यान में लेकर हरि-प्रेम-धुन॥
॥ हरिभक्ति॥

(नीरत) डूबा हुआ, मस्त। (स्थित प्रज्ञ) सभी विकारों से रहित। (अवरत)
स्थिर। (अवतस) श्रेष्ठ।