हरि भक्ति में मन को रमने दो
हरि भक्ति में मन को रमने दो
और हरि को “हरि” ही बनने दो
बहुविध आत्मा को बल दे दो
पाप वृत्तियाँ दूर ढकेलो
मेरे सङ्ग हे हरि ! रहना तू तू ही तू
बूँद अमृत की पिला देना तू ही
सङ्गी सङ्गी सङ्गी,
सङ्गी सङ्गी सङ्गी हरी सङ्गी सङ्गी सङ्गी
चित्त वृत्तियों में रङ्ग अपना भर दो
आकर्षित इन्हें अपनी ओर कर दो
कर दो, कर दो, इनको कर दो
छूटे ना, सङ्ग तेरा, हृदय में घर कर लो
हृदयासन पर बैठो, दूर कुमार्ग से कर दो
गाऊँ सदा तेरे गीत, तान तरङ्गित करो
मन क्या करे तुझ बिन
शरण में ले लो मुझको
हरि भक्ति में मन को रमने दो
और हरि को “हरि” ही बनने दो
बहुविध आत्मा को बल दे दो
पाप वृत्तियाँ दूर ढकेलो
मेरे सङ्ग हे हरि !
रहना तू तू ही तू
बूँद अमृत की पिला देना तू ही
सङ्गी सङ्गी सङ्गी,
सङ्गी सङ्गी सङ्गी हरी सङ्गी सङ्गी सङ्गी
धारणा ध्यान समाधि संयम
किया चितचोर को आत्मसमर्पण
संयम, संयम, पूर्ण हो संयम
लोहा मैं – तुम चुम्बक,
भक्ति में हूँ नीरत
मन स्थितप्रज्ञ – है अवरत
हरि दर्शन हुए अवतस
मनमोहक तान सुन
सुध बुध हो गई गुम
डूबा हरि के ध्यान में
लेकर हरि-प्रेम-धुन
हरि भक्ति में मन को रमने दो
और हरि को “हरि” ही बनने दो
बहुविध आत्मा को बल दे दो
पाप वृत्तियाँ दूर ढकेलो
मेरे सङ्ग हे हरि !
रहना तू तू ही तू
बूँद अमृत की पिला देना तू ही
सङ्गी सङ्गी सङ्गी,
प्यारे हरी, सङ्गी सङ्गी सङ्गी
हरी सङ्गी सङ्गी सङ्गी










