हरदम लड़ने वाली से तो,घर में फूहर नारि भली।

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(१)
हरदम लड़ने वाली से तो,
घर में फूहर नारि भली।
हरदम रोगी रहने से तो,
रहती जिंदगी ख्वार भली।
लात मार जो दूध खिंडा दे,
उससे बिना दुधार भली।
बीस निरर्थक रहने से तो,
“धर्मी”कली बनानी चार भली।

(२)
उत्तम् नारि वह कहलाती,
पति की आज्ञाकीरी हो।
दूूजी वह जो मात पिता सम,
जिसको दुनियां सारी हो।
तीजी वह जो जार पुरुष बिन,
रहती अधिक दुखारी हो।
“धर्मी”चौथी कुल के कारण,
सहती दु:खडा भारी हो।

(३)
द्वार द्वार का भिक्षुक जो है,
मान कहीं पर पाता ना।
धनी मनुष्य जो कृपण होता,
यश उसका कोई गाता ना।
सेवा कर निर्वाह करे जो,
सुख से रात बिताता ना।
“धर्मवीर”व्यभिचारी जन को,
घर में कोई बिठाता ना।

(४)
प्रथम् तल है अतल दूसरा,
तीजा वितल बताते हैं।
तीन नाम यह बतला दीने,
चौथा सुतल सुनाते हैं।
पंचम् नाम तलातल है,
और छटवां आगे गाते हैं।
जिसका नाम रसातल है,
पाताल सातवां पाते हैं।