हर दिशा हर काल में व्यापक सृष्टियज्ञ के परम पिता

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हर दिशा हर काल में व्यापक सृष्टियज्ञ के परम पिता

हर दिशा हर काल में व्यापक
सृष्टियज्ञ के परम पिता
सबके सुख-सौभाग्य-दाता
स्वस्वरूप ज्योतिप्रदा
हर दिशा हर काल में व्यापक

सृष्टि से पहले भी था
वर्चस्व अजर अमर का
हित का था साधक पुरोहित
ज्योति रूप महानता
ऐसे हित चिन्तक के सम्मुख
शीश नवाएँ हम सदा
हर दिशा हर काल में व्यापक
सृष्टियज्ञ के परम पिता

यज्ञ की विधियों का ईश्वर
ज्ञान कराता ऋतु अनुसार
अन्न खाद्य व पेय पदार्थ
ऋतु का पाते हम आधार
प्रभु के यजन से पा रहे हैं
रत्न-धातुएँ हम सदा
हर दिशा हर काल में व्यापक
सृष्टियज्ञ के परम पिता

दिव्य गुण कर्म और स्वभाव से
रत्नधर्ता दाता विशेष
करता जो सानिध्य प्रभु का
सम अलंकृत करता अग्नेश !
ज्योतिर्मयी ज्ञानी प्रभु से
पाते हम प्रेरित प्रभा
हर दिशा हर काल में व्यापक
सृष्टियज्ञ के परम पिता

सत्य हितेषी पृथु-पुरोहित
की सेवा शुश्रूषा करें
जो प्रकाशों का है देवता
अनुकरण अनुगम करें
जो कि बहुविध यज्ञों से
करता अलंकृत निज प्रजा
हर दिशा हर काल में व्यापक
सृष्टियज्ञ के परम पिता
सबके सुख-सौभाग्य-दाता
स्वस्वरूप ज्योतिप्रदा
हर दिशा हर काल में व्यापक

रचनाकार व स्वर :- पूज्य श्री ललित मोहन साहनी जी – मुम्बई
*रचना दिनाँक :– *

राग :- दरबारी+मेघ मल्हार
राग का गायन समय मध्य रात्रि, ताल कहरवा ८ मात्रा

शीर्षक :- मैं ज्ञानी विद्वान पुरोहित प्रभु की पूजा करता हूं
‌ वैदिक भजन८९९वां

*तर्ज :- *
0240-840

शब्दार्थ :-
प्रदा = चमक, कांति
यजन = यज्ञ के कार्य
अलंकृत = सजाया हुआ
अनुगम = पीछे पीछे चलने वाला, follower

प्रस्तुत भजन से सम्बन्धित पूज्य श्री ललित साहनी जी का सन्देश :– 👇👇

मैं ज्ञानी विद्वान पुरोहित प्रभु की पूजा करता हूं
(१) जो परमपिता परमेश्वर इस महान सृष्टि का रूप यज्ञ का पुरोहित है, जो इसके बनने के पूर्व से ही विराजमान है, जो इसकी रचना से सबका हित साधता है, जो इस संसार में रूप महान यज्ञ का कर्ता है, जो ऋतु के अनुसार सब प्रकार के खाद्य, पेय, लेह्य ,चूष्य आदि पदार्थों को उत्पन्न कर सबकी जठराग्नियों मैं उनको होमनेवाला होता है, जो अतिशय करके स्वर्ण रजत मणि माणिक्य अति उत्तम रत्नों का धारण करता और कराता है, उषा अग्नि स्वरूप ज्ञान स्वरूप सर्वज्ञ परमेश्वर की स्तुति करता हूं पूजा करता हूं।
(२) सदा सम्मुख उपस्थित रहने वाले, यज्ञ आदि शुभ कर्मों का उपदेश करने वाले, सर्वदा सर्वत्र पूजनीय, सुख शांति एवं आनंद के दाता दिव्य गुण कर्म स्वभावों के धारण करने कराने हारे पावन परमेश्वर की श्रद्धा भाव से ओतप्रोत होकर उपासक को उपासना करनी चाहिए।
(३) हमें चाहिए कि हम उस सच्चे हितैषी पुरोहित की सदा पूजा करें, उसकी सदा सेवा शुश्रूषा करें, जो कि व्यक्ति परिवार, समाज और राष्ट्र के कल्याण के लिए समय-समय पर यज्ञ आदि शुभ कर्मों का संपादन करता रहता है और उन अशुभ कर्मों के माध्यम से सदा अपने एवं अपने अनुयायियों को उत्तम गुण कर्म स्वभाव से अलंकृत करता रहता है।