हमारे देश की महिमा
(तर्ज- हमें तो लूट लिया मिलके हुस्न वालों ने )
हमारे देश की महिमा बड़ी सुहानी है।
सब से निराली है सब से पुरानी है।
हमारे देश की महिमा………..
१. कभी इस देश का दुनियाँ पे राज होता था।
यहाँ की रीत ही सब का रिवाज होता था।
हज़ारों सैंकड़ों गऊएँ घरों में रहतीं थीं।
तभी तो दूध की नदियाँ यहाँ पे बहतीं थीं।
पड़ोसी इस तरह आपस में प्यार करते थे।
सभी इक दूसरे पे जाँ निसार करते थे।
किसी दरवाज़े को ताला न कोई होता था।
हरेक आदमी बेखौफ़ हो के सोता था।
न जुआरी न शराबी न चोर होता था।
ऐसा वातावरण ही चहुँ ओर होता था।
हमारे देश की महिमा……….
२. हमारा देश ही मालिक था हर ख़जाने का।
यही था सोने की चिड़िया गुरु ज़माने का।
फ़ख़ हासिल था इसे देवघर कहाने को।
जहाँ में एक ही यह दर था सर झुकाने को।
हरेक ज्ञान का दाता इसे बताते थे।
कलाएँ सीखने सारे यहीं पे आते थे।
ऋषि मुनियों का यहीं पे निवास होता था।
ज्ञान भण्डार भरा जिनके पास होता था।
दिशाएँ गूँजतीं थीं वेद की ऋचाओं से।
सुगन्धि फैलती थी हवन की हवाओं से।
हमारे देश की महिमा………..
३. यहीं पे राम का आदर्श नज़र आया है।
यहीं पे कृष्ण ने गीता का गीत गाया है।
यहीं पे भरत से भाइयों के लगे मेले हैं।
इसी की गोद में अर्जुन व भीम खेले हैं।
हुए हैं द्रोण व भीषम से पुरुष लासानी।
दधीचि, हरिशचन्द्र और करण से दानी।
कहीं हनुमान कहीं विदुर जी की भक्ति है।
कहीं पर ब्रह्मचर्य की अमोघ शक्ति है।
लुटाईं दौलतें जिस पर सदा बहारों ने।
किया सिजदा इसी धरती को चाँद तारों ने।
हमारे देश की महिमा……….
४. यहाँ की देवियाँ विदुषी महान् होतीं थीं।
तेज की लाट व अग्नि समान होतीं थीं।
सती सीता अनुसूया शकुन्तला जैसी।
लोपामुद्रा शुभा सुलभा मदालसा जैसी।
गार्गी भारती जब उठ के बात करतीं थीं।
तो याज्ञवल्क्य व शंकर को मात करतीं थीं।
जभी कुन्ती या कौशल्या की याद आती है।
तभी सम्मान में गर्दन मेरी झुक जाती है।
‘पथिक’ इतिहास में यह खोज हमने भारी की।
सदा पूजा हुई इस देश की सन्नारी की।
हमारे देश की महिमा……….










