ज्ञान की ज्योत मन में जगा दो प्रभु।
स्वर :- श्री दिनेश आर्य पथिक
ज्ञान की ज्योत मन में जगा दो प्रभु।
राह भटके हुओं को दिखा दो प्रभु।।
क्या करें कुछ समझ में नहीं आ रहा।
बात बिगड़ी हुई है बना दो प्रभु।।१।।
हम सभी लोग आपस में मिलकर रहें।
प्रेम गंगा हृदय में बहा दो प्रभु।।२।।
सबके अंतःकरण जगमगाने लगे।
बस अविद्या का पर्दा हटा दो प्रभु।।३।।
फिर किसी और उलझन में उलझे न हम।
मन की उलझन से दामन छुड़ा दो प्रभु।।४।।
प्यास मन की बुझे एक ही घूंट से।
अपनी भक्ति का अमृत पिला दो प्रभु।।५।।
आ गयें हैं पथिक दर पे आशा लिए।
अपनी चरणों में हमको बिठा दो प्रभु।।६।।










