गुरुदेव प्रतिज्ञा है मेरी पूरी करके दिखला दूँगा ।
तर्ज-है प्रीत जहां की रीत सदा
गुरुदेव प्रतिज्ञा है मेरी
पूरी करके दिखलादूँगा ।
इस वैदिक धर्म की वेदी पद
मैं जीवन भेंट चढ़ादूँगा ।।
गुरुदेव प्रतिज्ञा है मेरी …..
धन पास नहीं तन मन अपना
श्री गुरुचरणों में धरता हूं ।
गुरु आज्ञा पालन करने की
मैं आज प्रतिज्ञा करता हूं ।।
अपना सर्वस्व लुटा कर भी
अपना कर्त्तव्य निभा दूँगा ।
इस वैदिक धर्म की वेदी पर …..
जन हित के लिए विष के प्याले
अमृत करके मैं पी लूँगा ।
उफ़ तक न करुंगा शोलों पर
हंसते हंसते मैं जी लूँगा ।।
कांटों से भरी इन राहों पे
फूलों की तरह मुस्का दूंगा ।
इस वैदिक धर्म की वेदी पर …..
पश्चिमी सभ्यता के बढ़ते
तूफ़ानों का मुँह मोडूँगा ।
मैं सागर को मथ डालूँगा
पर्बत का मस्तक फोडँूगा ।।
वेदों की अमृतवाणी का
मैं घर घर नाद बजा दूंगा ।
इस वैदिक धर्म की वेदी पर …..
जब शिष्य आपका उठ कर के
वेदों का बिगुल बजाएगा ।
इक बार ज़माना ऋषियों का
फिर’पथिक’ लौटकर आएगा ।।
भारत की पावन धरती को
फिर से मैं स्वर्ग बना दूंगा ।
इस वैदिक धर्म की वेदी पर …..










