गुरुकुल हरिपुर, जुनानी (ओडिशा) की ओर से समग्र देशवासियों को वेद स्वाध्याय

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श्रावणी पर्व

(रक्षाबन्धन) के अवसर पर हार्दिक शुभकामनाएं.

विक्रम सम्वत् 2081 तदनुसार 19 अगस्त 2024, दिन सोमवार

ऋषियों का मानना है, हमारा जो दुःख है, उसका मूलकारण अज्ञान है। जो व्यक्ति जितना अधिक अज्ञानी है, वह उतना ही अधिक दुःखी रहता है और जो जितना अधिक ज्ञानी है, वह उतना अधिक सुखी रहता है।

ज्ञान मनुष्य के लिए आवश्यक है। वेद का अर्थ ज्ञान है। जहां ज्ञान होता है, वहां दुःख नहीं होता है। हमें दुःखों से बचाने के लिए वेदादि शास्त्र जीवनोपयोगी हैं। हमें शास्त्र पदे पदे पर यह बताते हैं कि हम अब कहाँ खड़े हैं।

हम यदि वेद के एक एक मन्त्र पर विचार करेंगे तो जीवन में महत्त्वपूर्ण आमूल चूल परिवर्तन होगा। वेद की प्रत्येक पंक्ति हीरे मोती के समान महत्त्वपूर्ण हैं और सम्भालकर रखने योग्य हैं। वेद को पढ़ने के लिए नहीं पढ़ना है, बल्कि जीवन को उत्कर्ष बनाने के लिए वेद को पढ़ना है।

प्रायः यह कहा जाता है कि वेद को समझना बड़ा कठिन है। कठिन कहकर वेद के स्वाध्याय से हम विमुख हो रहे हैं, किन्तु जो अपने आपको प्रयत्न करने से बचाता है, उसके लिए वेद कठिन हैं। आज वेद हमारी भाषा में उपलब्ध हैं, इसी प्रकार स्वयं ईश्वर हममें विद्यमान हैं, हमारी श्रद्धा व निष्ठा वेद के प्रति होगी तो ईश्वर हमको वेद के रहस्यों से अवगत करायेंगे।

मनुष्य का परम कर्तव्य है कि वह अज्ञान को किसी भी तरह समाप्त करे, सब क्रियायें तब सार्थक होतीं हैं, जब सब क्रियायें हमें ज्ञान की ओर ले जाती हैं, हमारा ज्ञान- कर्म- उपासना ठीक हो, ये तीन सन्देश हमें वेद प्रदान करते हैं।

विशिष्ट सहयोग आशीर्वाद / संरक्षण –

श्री रामभज मदान, श्री ओम्प्रकाश हंस, श्री पूर्णसिंह डबास, श्री सुरेन्द्र कुमार बुद्धिराजा, श्री दलीप सिंग सैनी, श्री रमेश चन्द्र हाण्डा, श्री सुमित भाटिया, आर्यसमाज राजेन्द्र नगर, आर्यसमाज साकेत, आर्यसमाज बालीनगर (नई दिल्ली), आर्य श्री सुरेशचन्द्र अग्रवाल अहमदाबाद, श्री अश्विनी अग्रवाल, श्री गोविन्द गर्ग, श्री यश आर्य, श्री चाँदरतन दम्मानी, माता कुन्ती देवी आर्या, आचार्य कैलाश चन्द्र शास्त्री, आचार्य राहुल देव, आर्यसमाज बड़ाबाजार कोलकाता, श्री अरूण कुमार शर्मा, श्री सांवरमल आलमपुरीया, श्री जयसिंह कुण्डालिया, श्री सुरेशचन्द्र अग्रवाल, श्रीमती सरलादेवी, सिलीगुड़ी, श्री पीयुष आर्य, चेन्नई, श्री भगवान दास ब्यावर, श्री प्रताप कुमार साधक, लखनऊ, श्री अजय पृथ्वीराज गोयल, श्री ओ.पी. जैन, बड़ोदरा, श्रीमती सुमन जैन, भावनगर, श्रीमती अनिता गर्ग, श्रीमती ज्योत्स्ना, सुरत, श्री शंकर अग्रवाल, श्री विजय कुमार लाहोटी, श्री विनोद जायसवाल, श्री सुनिल अग्रवाल, श्री नीरज, आर्यसमाज बैजनाथपारा रायपुर, श्री सिद्धेश्वर पण्डा, श्री ताराकान्त प्रधान, श्री वैद्य मनोज कुमार, श्री वैद्य गदाधर शान्त, श्रीमती त्रिवेणी पढीयार, श्री प्रसन्न कुमार पाढी, श्री टेकम देवांगन, श्री हेमन्त दण्डसेना।

गुरुकुल हरिपुर, जुनानी, पो. गोड़फूला, जि. नुआपड़ा (ओडिशा) 766105

दूरभाष – 9437188321,9178371663, 8658834231

इमेल – gurukulharipur2019@gmail.com

बेवसाईट- www.gurukulharipur.org

पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात् पूर्णमुदच्यते ।

पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ।।

(बृहदारण्यक उपनिषद् ५/१)

श्रावणी पर आयोजित कार्यक्रम –

  1. गुरुकुलीय ब्रह्मचारियों का उपनयन एवं वेदारम्भ संस्कार।
  2. पञ्चदश चतुर्वेद पारायण यज्ञ का शुभारम्भ।
  3. सम्माननीय आचार्यगणों के द्वारा छत्तीसगढ़ व ओड़िशा के विभिन्न जिलों के अनेक स्थानों पर वेद प्रचार सप्ताह कार्यक्रम।
  4. गुरुकुलीय ब्रह्मचारियों का विविध शारीरिक व बौद्धिक प्रतिभा प्रदर्शन। . आर्यकुल गौरव, आर्यश्रेष्ठी, गुरुकुल हरिपुर के यशस्वी कुलपति, दानवीर एवं

5. डालर फाउण्डेशन के अध्यक्ष श्री दीनदयाल गुप्त जी एवं श्री अश्विनी अग्रवाल कोलकाता के संयुक्त सहयोग से नवनिर्मित राष्ट्रभृद् गौशाला, डालर फाउण्डेशन के सहयोग से ही प्राप्त बाह्य व्यायाम उपकरण (जीम) एवं नूतन दो सौ कुर्सियों, सभा भवन के नीचे नये रूप से निर्मित भोजनालय का शुभोद्घाटन श्री कुलपति जी के शुभ करकमलों से होगा। इसी प्रकार डालर फाउण्डेशन कोलकाता एवं गुरुकुल हरिपुर के प्रधान, आर्यरत्न श्री जयदेव आर्य जी के सहयोग से निर्माणाधीन विशाल सभा भवन का निरीक्षण एवं निर्माण सम्बन्धी मार्गदर्शन श्री कुलपति जी का प्राप्त होगा।

विशेष सूचना-

  1. भारतीय संस्कृति की पहचान, पितृ, ऋषि और देव ऋण से मुक्त होने का सन्देश देने वाला यज्ञोपवीत आपकी सेवा में प्रेषित है। कृपया सहर्ष स्वीकार कर श्रावण पूर्णिमा के दिन पुराना यज्ञोपवीत को परिवर्तन करें।
  1. श्रावणी से प्रारम्भ हुआ पञ्चदश चतुर्वेद पारायण यज्ञ की पूर्णाहुति गुरुकुल के परादश वार्षिक महोत्सव (पञ्चदशकम्) एवं व्यक्तित्व निर्माण शिविर के अवसर पर 25.26.27 जनवरी 2025 दिन शनि, रवि, सोमवार को होगी। अतः गुरुकुल प्रेमी महानुभावों से निवेदन है कि इन दिनों अन्यत्र कहीं कार्यक्रम न बनाकर गुरुकुलीय महोत्सव में पधारने हेतु अभी से मन बना लेवें।

‘दृष्टि आकर्षण- गुरुकुल के समस्त सेवा प्रकल्प आप जैसे उदारमना दानदाताओं के सहयोग पर निर्भर है। आप अपनी सहयोग राशि गुरुकल हरिपुर के नाम चेक द्वारा भेजें अथवा भारतीय स्टेट बैंक नुआपड़ा कोड संख्या-6078 IFSC: SBIN0006078 के खाता क्रमांक 32201200324 में जमा कर सूचना देने की कृपा करेंगे। संस्था का पान नम्बर-AAAAJ9932H है। ध्यान रहे गुरुकुल को दिया गया दान पर आयकर अधिनियम की धारा 80 जी के अन्तर्गत कर मुक्त होगा ।

वेद सब के लिए हैं और सार्वकालिक हैं। वेद का विकल्प संसार का कोई ग्रन्थ नहीं ले सकता। मनुष्यों के द्वारा रचित ग्रन्थों में देश, काल, परिस्थिति का प्रभाव रहता है, किन्तु ईश्वर की रचना वेद त्रिकालातीत है। अन्य सभी ऋषिकृत ग्रन्थ वेद के सहायक ग्रन्थ हैं, इसलिए जीवन में ईश्वर के ज्ञान वेदवाणी पर विशेष बल देना चाहिए।

वेद में मन्त्र हैं, मन्त्र का अर्थ जीवन की सारी विद्यायें, विचार, ज्ञान-विज्ञान, ज्ञान की प्राप्ति, जीवन के सब प्रकार की दिव्यता आदि लेना चाहिए। मन्त्र जप से हमारे जीवन में आत्म विश्वास बढ़ता है, भगवान् की सारी दिव्यता मिलती है, हमारी ज्ञान निष्ठा व वेद निष्ठा बढ़ती है, जिस किसी ने मन्त्र को जीवन में स्थान दिया, उसकी बुद्धि श्रेष्ठ बनती है, उसकी बुद्धि श्रेष्ठ कार्यों में निमग्न होती है।

मन्त्र जप से वेद का स्वाध्याय होगा, इससे योगाभ्यास व ध्यान सिद्ध होगा, जिससे जीवन में हमें सफलतायें मिलेंगी। ईश्वर का मुख्य नाम ओ३म् से बड़ा कोई नाम नहीं, मन्त्र जप से कोई बड़ा काम नहीं है, अतः इन कार्यों में अपने को नियोजित करें। वेद पढ़ने का फल होता है कि हम भगवान् की उपस्थिति में काम करते हैं,

ब्रह्मभाव से जीते हैं, भगवान् को हमेशा प्रत्यक्ष उपस्थित मानते हैं अर्थात् भगवान् को हमेशा अपने आस-पास स्वीकार करते हैं, अपने को कभी अकेला अनुभव नहीं करते, हम कभी अकर्मा होकर नहीं रहते, मन, वाणी और शरीर से पुरुषार्थ करते हैं, सारी बुरी आदतें छोड़ देते हैं, झूठ नहीं बोलते, गुस्सा नहीं करते, क्रोध व झूठ से बचते हैं, क्योंकि उसको पता है कि क्रोधी व झूठ बोलने वाला कितना भी बड़ा पाप कर्म कर सकता है।

इसी प्रकार वेद पढ़ने वाला ध्यान के काल में एकाग्रता का पालन करता है तथा व्यवहार के काल में वह स्थितप्रज्ञ रहता है। यदि चञ्चलता के कारण वृत्तियाँ = स्मृतियाँ उठती हैं, तो वह उस समय सब पदार्थों में ब्रह्म को देखता है अर्थात् दृश्य में द्रष्टा बनकर सबके स्रष्टा को सृष्टिकर्ता को देखता है। जिस समय जो करना चाहिए, वह उसको करता है, जिस समय जो नहीं करना चाहिए, उसको नहीं करता अर्थात् विधि व निषेध का ज्ञान रखता है। जीवन का सबसे बड़ा सन्देश या उपदेश को सदा स्मरण रखता है-

ओ३म् विश्वानि देव सवितर्दुरितानि परासुव। यद्भद्रं तन्न आसुव ।।

(यजुः. 30.03)

अर्थात् दुरित, दुःख दुर्गुण, दुर्विचार, दुर्व्यसन व दुर्बलताओं से उभर जाता है और, जितने भी सद्भाव, सगुण व जो भी कल्याण कारक गुण कर्म-स्वभाव, सुख आदि पदार्थ हैं, उनसे जुड़ जाता है। वह अपने अन्दर अपूर्णता का अनुभव नहीं करता।