गुरुदेव दयानन्द तुझे धन-धन-धन।
गुरुदेव दयानन्द तुझे
धन-धन-धन।
तेरी दया व उदारता ने
जीत लिया
मन कैसा जादू किया तूने।
भ्रम मेट दिया तूने-२ गुरूदेव….
जब से पढ़ा है हमने
सत्यार्थ प्रकाश को।
तब से ही भूल बैठे
अन्धविश्वास को।
दूर हुए सब विघनऽऽ-२
तुझे धन…।।१।।
हृदय विशाल देखो कैसा
योगीराज का लेश मात्र लोभ था
ना तख्त और ताज का
तुने छुये न रतनऽऽ-२ तुझे धन…।।२।।
तर्क की कसौटियों पर
पूरा ही तू पाया है।
हजारों विरोधियों ने तुझे
आजमाया है।
गये करके नमनऽऽ-२ तुझे धन…।।३।।
किसी ने पिलाये तुझे
विष भरे प्याले।
किसी ने “बेमोल” फेंके
विष धर काले। किये
लाखों यत्नऽऽ-२
तुझे धन….।।४।।










