गोलियां सीने पे खाके चल दिये ।
तर्ज – दिल के अरमाँ
गोलियां सीने पे खाके चल दिये ।
प्यास कातिल की बुझाके चल दिये ।।
रक्त से वैदिक बगीचा सींचकर ।
धर्म हित मरना सिखाके चल दिये ।।
झुक रहीं संगीन सीना सामने ।
कदम आगे को बढ़ाके चल दिये ।।
गंगातट जंगल में मंगल कर दिया ।
कांगड़ी गुरूकुल बनाके चल दिये ।।
जामा मस्जिद पे खड़े हो एक दिन ।
वेद ध्वनि सबको सुनाके चल दिये ।।
पाठ समता का पढ़ाया आपने ।
चक्र शुद्धि का चलाके चल दिये ।।
भाई से भाई मिलाया था गले ।
प्रेम की गंगा बहाके चल दिये ।।










