घर का है सिंगार नारी

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घर का है सिंगार नारी

घर का है सिंगार नारी,
सदा सुखदाई हो,
(पर) वे घर उजड़े जान
जिनमें ऐसी लुगाई हो।। टेक ।।

कलहारी नित कलह में
रोज सोती राड़ जगावे,
किसी की माने कांण
नहीं कुल कुनबे ने धमकावे,
राखे रोज लड़ाई हो,
वे घर उजड़े जान…।।1।।

दूजी हो कामचोरी करके
फैल खाट में पड़ जा,
कभी तो सिर में दर्द
बतावे कभी भूतड़ी बड़जा,
जिसकी नहीं दवाई हों,
वे उजड़े जान…।।2।।

तीजी हो फूहड़ बे
सहूरी करे जो काम बिगाड़े,
बोलण तक की सोधी
कोन्या बिना बात मुंह फाड़े,
समझे न समझाई हो,
वे घर उजड़े जान…।।3।।

कर कुणबे तै हैरा फेरी
मंगा मिठाई मेवा,
जीभ चटौरी माल
उड़ावे छोड़ पति की सेवा,
सबकी लगै बहकाई हो,
वे घर उजड़े जान…।।4।।

अपने घर की अच्छी
मंदी जाके बाहर बतावै,
चुगली निन्दा करे गैर की
रोज उल्हाणे ल्यावै,
घर-घर लोग हंसाई हो,
वे घर उजड़े जान…।।5।।

दिन में दस बार पिंडी
धोवे करे कुबध के काम,
राह में करती चले
इशारे हरदम नीत हराम,
इज्जत खाक मिलाई हो,
वे घर उजड़े जान…।।6।।

बात काटणी गाम हडोरी
पति तै बात छिपावै,
छिप-छिपकर ले गुरु मंत्र,
पर पुरुष के पांव दबावै,
धार में नाव डुबोई हो,
वे घर उजड़े जान…।।7।।