गीत रूप, भाव की भाषा, भक्ति में संगति लाए।

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गीत रूप, भाव की भाषा, भक्ति में संगति लाए।

गीत रूप, भाव की भाषा,
भक्ति में संगति लाए।
नस-नाड़ी झंकृत कर दे,
भक्ति में शक्ति जगाए।

स्वर लहरियों में श्रोता,
मस्ती में झूम जाए।
आओ मिलकर गीत गाएँ,
झूमें ज़रा, झूमें ज़रा।

सुनिए जी सुनिए,
सुनिए जी सुनिए,
संगीत सुनते देवता,
सुनिए जी सुनिए।

स्वर लहरियों में है नशा,
स्वर लहरियों में है नशा,
स्वर लहरियों में है नशा,
स्वर लहरियों में है नशा।

शांत रस में ईश की भक्ति,
वीर-रस में देश की।
गायकों में उठे लहरियाँ,
बड़े-बड़े वेग की।

मन रे ओ मन रे,
मन रे ओ मन रे।
उछलती लहर छलका,
मन रे ओ मन रे।

सोमरस को उद्बुद्ध करना,
वीर-रस भुजा फड़काना।
ठंडी छातियाँ गरमाए,
आत्मत्याग कर लेना।

पुरुषार्थ ही तू करा,
पुरुषार्थ ही तू करा,
पुरुषार्थ ही तू करा,
पुरुषार्थ ही तू करा।

मातृभूमि, मातृभाषा,
मातृसंस्कृति का सम्मान।
आत्मत्याग भावना से,
प्यार जगाता जा।

सुख-समृद्धि इससे ही,
मानव परिवार की होगी।
ईर्ष्या-द्वेष, द्रोह की,
कोई जगह ना होगी।

मन से ही मन से,
मन से ही मन से।
वीरों की चमके बिजलियाँ,
मन से ही मन से।

मानवों को दे दे नई दिशा,
मानवों को दे दे नई दिशा,
मानवों को दे दे नई दिशा,
मानवों को दे दे नई दिशा।

दूसरे का अधिकार रक्षण,
और पर पीड़ा हरण।
भावना हृदय कलश में,
करती जाए गुंजन।

चंद्र की शीतल किरणों से,
वनस्पति पाती रस।
वैसे पाती गिरी जातियाँ,
वीरों से उत्कर्ष।

मन रे ओ मन रे,
मन रे ओ मन रे।
दिखा क्षत्रियों सी वीरता,
बन रे तू बन रे।

परवाना मातृभूमि का,
परवाना मातृभूमि का,
परवाना मातृभूमि का,
परवाना मातृभूमि का।

गीत रूप, भाव की भाषा,
भक्ति में संगति लाए।
नस-नाड़ी झंकृत कर दे,
भक्ति में शक्ति जगाए।

स्वर लहरियों में श्रोता,
मस्ती में झूम जाए।
आओ मिलकर गीत गाएँ,
झूमें ज़रा, झूमें ज़रा।

सुनिए जी सुनिए,
सुनिए जी सुनिए,
संगीत सुनते देवता,
सुनिए जी सुनिए।

स्वर लहरियों में है नशा,
स्वर लहरियों में है नशा,
स्वर लहरियों में है नशा,
स्वर लहरियों में है नशा।

रचनाकार व स्वर :- पूज्य श्री ललित मोहन साहनी जी – मुम्बई
*रचना दिनाँक :– * ११.९.२००८ २.०० मध्यान्ह

राग :- कल्याणी (कर्नाटक संगीत में)
राग :- यमनकल्याण (हिंदुस्तानी संगीत में)
गायन समय रात्रि का प्रथम प्रहर, ताल कहरवा ८ मात्रा

शीर्षक :- महान धन
वैदिक भजन८८२ वहां

*तर्ज :- *
829-0230

संगति = संगम, मेल
झंकृत = गूंजाना
उद्बुद्ध = खिलाहुआ, उठाहुआ, ज्ञान-प्राप्त
उत्कर्ष = समृद्धि

प्रस्तुत भजन से सम्बन्धित पूज्य श्री ललित साहनी जी का सन्देश :– 👇👇

महान धन

भक्ति की भाषा संगति है। प्रत्येक भाव गीत के रूप में आकर जहां गाने वाले की नस-नस, नाड़ी- नाड़ी को झंकृत कर बोल उठता है, वहां साधारण जनता में भी उसका प्रचार गायकों की स्वर लहरियों का सहारा लेकर खूब वेग से हो जाता है।
देवता तो जैसे सुनते ही संगीत को।
शान्त रस द्वारा प्रभु को, वीर-रस द्वारा देश और राष्ट्र को खूब रिझाया जा सकता है।
हमें उस सोमरस को उद्बुद्ध करना है जो वीरों की भुजाएं फड़का दे, ठंडी छातियां गरमा दे, आत्मत्याग की एक उछलती लहर सी चला दे। मातृ-भूमि, मातृ-भाषा, मातृ-संस्कृति से प्यार करना सिखला दे।
छोटे-छोटे स्वार्थों की सिद्धि तो संभवत: अत्याचार तथा बलात्कार से भी हो सकती है। क्षणिक लाभ किसी जाति को दास बनाकर उसकी संपत्ति लूट लेने से भी हो जाना संभव है। चोर, चोरी करके कुछ धन कमा ही लेता है। परन्तु वह धन स्थाई नहीं होता। वास्तविक धन वह है जो स्वयं पैदा किया जाए। किसान खेती से नया अनाज पैदा करता है। उसने संसार की संपत्ति में कुछ वृद्धि की है।
ऐसा धन, तथा उसे पैदा करने वाली कला, “सोम” है।
डाकू अत्याचार कर एक जगह पड़े रुपए को दूसरी जगह रख ही तो देता है। कृषक, बिना अत्याचार के उसकी मात्रा बढ़ाता है। लड़ाकी संतान पिता की जायदाद पर छीना- झपटी कर उसे अभियोगों में नष्ट कर देती है। होनहार सन्मति स्वयं नई कमाई कर परिवार को और समृद्ध बनाती है। ऐसे ही मानव परिवार की समृद्धि उसमें प्रेम प्यार की वृद्धि से ही होगी। प्रत्येक जाति को उसकी अपनी दिशा में उन्नति करने का अवसर हो एक देश दूसरे देश को प्रोत्साहित करें। तभी सब में कला का, विज्ञान का, विद्या का, आर्थिक तथा आध्यात्मिक संपत्ति का विकास हो सकता है। “महान धन”का बीज तो “सोम” अर्थात् सात्विक वीररस सही है। यह मीठा रस जिसमें द्वेष की, ईर्ष्या की, द्रोह की कड़वाहट का लेश भी ना हो।

वीरों के हृदय में एक पवित्र गुनगुनाहट सी होती रहती है। प्रत्येक समय पर पीड़ा- हरण तथा परस्वत्व-रक्षण की पुण्य भावना उनके हृदय-कलश में एक गुंजार सी पैदा किए रहती है। जैसे चांद की शीतल किरणों से संसार की खेतियां एक उत्पादक रस प्राप्त करती हैं। ऐसे ही क्षत्रियों की वीरता से, मरी हुई जातियां नया जीवन -लाभ करती हैं। कुम्भलाई हुई संस्कृतियां, फिर से लहलहा उठती है।
क्षत्रिय अपने देश, अपनी भाषा, अपनी संस्कृति का परवाना है। उस पर जान दे देगा पर उसकी आन पर बट्टा न लगने देगा। इतना ही नहीं, वह संस्कृति मात्र का परवाना है।
🎧882वां वैदिक भजन🕉️👏🏽