गर्दन कभी झुकी ना

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गर्दन कभी झुकी ना

तर्ज – रहा गर्दिशों में हर दम……

गर्दन कभी झुकी ना,
सीने पे गोली खायी।
अपने वतन की ख़ातिर,
फाँसी गले लगायी।।

वो कौम के सिपाही,
परहित में मर मिटे जो यादें “सचिन” रे
उनकी, जाती नहीं भुलायी गर्दन
कभी झुकी……….

रोशन हुई कहानी,
वीरों की वो जवानी भूलेंगे
ना कभी हम, वो हंसती हुयी
विदायी गर्दन कभी झुकी…..

बेघर हुये घरों से,
नामो निशां ना पाया प्राणों की दे
आहुति, वीरों ने जाँ गँवायी गर्दन
कभी झुकी………..

मरने के बाद जिनकी,
यादें सता रही हैं दुश्मन के सामने ना,
नजरें कभी झुकायी गर्दन कभी झुकी……