एक बार आए थे, योगी रूप धार के
एक बार आए थे,
योगी रूप धार के
दयानन्द चल दिए,
बिगड़ी संवार के।।
देश के सुधारक थे,
वो दुनियां के साथी
थे राह में झेले दुःख
अति भांति-भांति के।
करते चले गए फिर भी
काम उपकार के…..।।
दुःखियों के संग दुःखी
होना यही काम था यत्न
किया दुःख भगे हर इंसान का।
सुखी हुए देश आए
दिवस बहार के ……।।
ऋषि थे हितैषी पर
हम जान पाए ना।
जहर पिलाया हमको
किंचित भाए ना बेवफा
बने हम उस वफादार के….।।
किए हैं अनंत उपकार उस
योगीराज ने भूल गया जो भी
जाने फूटे मेरे भाग ने पूजनीय
हंस ऋषि सब संसार के…….।।










