दुनियाँ बनाने वाले,कैसी तेरी माया है।

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दुनियाँ बनाने वाले,कैसी तेरी माया है।

दुनियाँ बनाने वाले,
कैसी तेरी माया है।
कहीं बरसात, कहीं धूप,
कहीं छाया है।
कहीं बरसात, कहीं धूप……।।1।।

पर्वतों की चोटियाँ हैं,
आसमाँ को चूमतीं।
रेशमी घटाएँ काली,
पर्वतों पे घूमतीं।
कहीं चाँद-सूरज कहीं,
सागर को बनाया है।
कहीं बरसात, कहीं धूप……।।2।।

गुजरते पलों की टोली,
यही गुनगुना रही।
रूके न समय की गाड़ी,
धीरे-धीरे जा रही।
कल आज और कल का,
तूने चक्कर क्या चलाया है।
कहीं बरसात कहीं धूप……।।3।।

अच्छे-बुरे कर्मों की है,
पूँजी सब के साथ में।
सभी वह खिलौने जिनकी,
चाबी तेरे हाथ में।
नाचना पड़ा है,
तूने जैसे भी नचाया है।
कहीं बरसात, कहीं धूप……।।4।।

कौन सी जगह है खाली,
कहाँ तेरा वास है।
कहीं तू नहीं है लेकिन,
फिर भी सब के पास है।
किसी ने भी ‘पथिक’ न,
इस उलझन को सुलझाया है।
कहीं बरसात, कहीं धूप……।।5।।