दुःखद दूर हुआ हिम-त्रास है
दुःखद दूर हुआ हिम-त्रास है,
सुखद आगत श्री मधुमास है।
अब कहीं, दुःख का न निवास है,
सब कहीं बस हास-विलास है ॥ १॥
दिवस रम्य, निशा रमणीय है,
सब दिशा विदिशा कमनीय हैं।
सुखद मन्द सुगन्ध समीर है,
चित चहे अब शीतल नीर है ॥ २॥
विविध पुष्प खिले छविवन्त हैं,
अति मनोहर रंग अनन्त हैं।
मधुप को करते मधु दान हैं,
अतिथि का करते सब मान हैं ॥३॥
दुखित दीन जिन्हें हिम की व्यथा,
असहनीय रही नित सर्वथा।
मुदित हैं अति शीत-विनाश से,
छूट गये अब वे यम-पाश से ॥ ४॥
खिल गये अब पंकज-पुञ्ज हैं,
कर रहे जिन पै अलिपुब्ज हैं।
मिट तुषार गया सब सर्वथा,
विशद कान्ति हुई शशि की तथा ॥ ५॥
भ्रमर-शब्द मनोहर गान है,
सुमन ही जिनकी मुसकान हैं।
पवन कम्पि मञ्जु लता सब,
सुखद नृत्य मनो करती अब ॥ ६ ॥










