रथाय नावमुत नो गृहाय नित्यारित्रां पद्धती रास्यग्ने ।
अस्माकं वीरौं उत नो मघोनो जनाँश्च या पारयाच्छर्म या च।
। ऋः १. १४०.१२
तर्जः मी आज फूल झाली
पानी में बाढ़ भारी, संकट बढ़ा ही जा रहा
चारों तरफ तबाही।
॥ पानी में ॥
भय है हमारे रथ बहें, हुए भवन धराशायी
जन पशु को लीलती हुई बनी बाढ़ दुःखदायी,
जानोमाल के विनाश से बढ़े दुःखमय व्याधि।
॥ पानी में ॥
परिवार धन हमारे रथ जो भी बचे बचा लो
धन माल सम्पदायें सब नाव पर चढ़ा लो वरना
लपेट बाढ़ की हो जायेगी त्रासदायी।
॥ पानी में॥
संसार भी नदी है, उफान उठाते दस्यु
पर दिव्य संदेशों के इस नाव में हैं चप्पु
माँझी बनाके प्रभु को उस पार जा उतारी
॥ पानी में॥
तरणी है पद्दती काटे जलरूपी वासनायें
केवल न अपनी चिन्ता औरों को भी बचायें
औरों के की तरण में अपनी लगे भलाई॥
॥ पानी में ॥
सब देहों के रथों को निज नाव में बिठा लो
परिवार राष्ट्रवीरों के धनिकों को भी बुला लो
आरूढ़ होवें इस पर छोटे बड़े संसारी॥
॥ पानी में ॥
यह राग द्वेष मद की उफान वाली सरिता
सङ्कल्प कर चढ़े तो क्यों न बनें विजेता
अनुभूति ब्रह्मानन्द की पाते रहे उपहारी
॥ पानी में॥
तारो हमारी नैया संसार के खिवैया
तो चढ़ा दो नित्यारित्रा पद्धती तैयार नैया
तरणी को तारो भगवन् सुनो भक्त की दुहाई॥
(लीलना) बहा देना। (पद्मती) पेरों वाली। (नित्यारित्रा) नित्य चप्पुओं वाली। (आरूढ़)
चढ़ना सवार होना। (दस्यु) शत्रु। (तरणी) नाव। (दुहाई) पुकार। (उपहारी) याज्ञिक।










