धृतराष्ट्र तो माना अन्धा था
धतराष्ट्र तो माना अन्धा था,
पर भीष्म द्रोण चुप कैसे रहे
जब द्रुपद सुता रोई चीख-2
तो क्योंना कमां पर हाथ गये
एक बार भी दोनों महाबली
फटकारते उस दुर्योधन को।
जो कुछ भी होता तभी होता,
फिर देखते क्यों जंग के दिन
को धिक्कार है इस कायरपन को,
रहे मूक बने ना दो शब्द कहे
जब द्रुपद सुता….॥1॥
लाज की आँखें रोती थीं
निर्लज्जता ने जब व्यंग कसे।
अबला की चींख पुकारों पर वो,
नीच धूर्त्त खिलखिला हंसे॥
थे पांचों भ्रात संकट में फंसे,
इन कटु वचनों को कैसे सहे॥
जब द्रुपद सुता….॥2॥
द्रोणी दुःशासन शकुनी
दुर्योधन के बैठा पास करण।
वाणी के तीखे पहारों से हो
गया भीम था काल वरण॥
लगने लगा अब टूटेगा परण,
नयनों से धर्म की अश्रु बहे ॥
जब द्रुपद सुता….॥३॥
कुन्ती सुत भीम ने गर्जना की,
छा गया सभा में सन्नाटा।
मानो कुछ होने वाला है,
वो धृतराष्ट्र अन्धा कांपा॥
दुर्भाग्य ये आर्यवर्त का था,
निज वीरता के अरमान ढये॥
जब द्रुपद सुता….॥4॥
कृष्णा के खिंचते केस देख
बोला था भीम चुप कैसे रहूं।
आखिर कर्मठ कहा दुःशासन
एक दिन में तेरा पिऊँ लहू॥
दुर्योधन की जंघा तोडूं
इतिहास में पन्ने जुड़े नये ॥
जब द्रुपद सुता….॥5॥










