धर्म पर शीश जिनके चढ़े हैं
धर्म पर शीश जिनके चढ़े हैं
उन शहीदों को कैसे भुलायें।
जां हथेली पै लेकर बढ़े हैं याद
उनकी भला क्यों ना आये॥टेक॥
याद होगा हकीकत सभी को
धर्म पर जान अपनी खपादी।
देखता रह गया था जमाना
आन पर अपनी गर्दन कटादी॥
पन्ने इतिहासों के वो पढ़ें हैं
मासूमों ने भी सर थे कटाये॥1॥
मतिराम उफ कर सका ना
सर पै चलता रहा जिसके आरा।
गुरु तेगबहादुर का बलिदान
कहता है शीशगंज का गुरुद्वारा॥
नींव के बनके पत्थर गड़े हैं
उनके फरजन्द ने सिंह सजाये॥2॥
याद दीवार सरहिन्द की है,
जिसमें जिन्दा दो बच्चे खपे हैं।
याद वैरागी और उसका बेटा,
मांस सण्डासियों से खिंचे हैं।॥
जीते जी दुश्मनों से लड़े हैं,
अन्त में अपनों से मांत खाये ॥3॥
श्रद्धानन्द ने जगाई जो ज्योति,
भूल पायेंगे उसको कभी ना।
ऐसे दर्वेश का एक जालिम,
गोली से कर गया छलनी सीना॥
जुल्मों के हम सताये पड़े हैं,
जख्म गहरे थे जो भर ना पाये ॥4॥
खून से अपने अपनी कहानी,
लेखराम ने लिखकर दिखादी।
कैसे भूलेंगे हम उसको बोलो,
याद बेटे की जिसने भुलादी ॥
पेट में जिसके छुरे गड़े हैं,
कर्मठ क्यों गीत उसके ना गाये ॥5॥










