धर्म की महिमा अपार
(तर्ज-वक्त के दिन और रात वक्त के कल और आज)
धर्म की महिमा अपार। धर्म पर ठहरा संसार।
धर्म की रक्षा करो। धर्म है सब का आधार ।
१. धर्म का रुतबा बड़ा धर्म का ऊँचा मुकाम।
धर्म ईश्वर का नियम धर्म कुदरत का निज़ाम।
धर्म को समझो ज़रा धर्म पर कर लो विचार…
२. धर्म तो इनसान की ज़िन्दगी का नाम है।
धर्म तो भगवान् का इक अमर पैग़ाम है।
वक्त पड़ने पर सदा धर्म पर होना निसार….
३. धर्म को पहचानते लोग सब रहते यहाँ।
फिर मज़हब मत पन्थ को धर्म क्यों कहते यहाँ।
धर्म को आकाश से रख दिया नीचे उतार…
४. पापियों के ख़ौफ़ से धर्म डर सकता नहीं।
तीर से तलवार से धर्म मर सकता नहीं।
आग में पड़कर सदा आ गया इस पे निखार…
५. जब कभी संसार में धर्म को मारा गया।
मिट गईं सब ताकतें दबदबा सारा गया।
देख लो इतिहास में हैं मिसालें बेशुमार…
६. जब यहाँ कर्त्तव्य को धर्म समझा जाएगा।
तब चमन उजड़ा हुआ झूमेगा मुसकाएगा।
‘पथिक’ छाएगी यहाँ हर तरफ़ फिर से बहार…










