धर्म और कर्म विहीन ना फूलते-फलते

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धर्म और कर्म विहीन ना फूलते-फलते

धर्म और कर्म विहीन
ना फूलते-फलते
ध्यान-उपासना धर्म
कर्म के फल फलते

है जो अश्रद्धालु जन
चाहे तो थोड़े दिन
आनन्द मौज करते
हो जाते फिर अनमन
स्थाई रूप से कभी
होते ना समृद्धशाली
बुरे कर्म अखड़ते
धर्म और कर्म विहीन
ना फूलते-फलते

जो है श्रद्धालु-जन
समझो के थोड़े दिन
हो जाएँ कुछ कष्टापन
कष्ट टले तो शमन
जीवन कर्म की गति,
जागती जिससे सुमति
याज्ञिक श्रद्धा को वरें
धर्म और कर्म विहीन
ना फूलते-फलते
ध्यान-उपासना धर्म
कर्म के फल फलते

माया के जाल में फँसे
हानि अन्यों की करते
हिंसक वाणी के लिए ही
पाप दुरित में पड़ते
वार उनका दोधारी
खुद बढ़ते औरों पे भारी
गिरतों पर वो हँसते
धर्म और कर्म विहीन
ना फूलते-फलते

उपक्षय-घात-पात-हिंसा
यही उनके दुर्लक्ष्य
झूठ से होता दिन शुरू
झूठ को मानते सत्य
एक दिन वो भी आता
खुलता पाप का खाता
औंधे मुँह गिरते
धर्म और कर्म विहीन
ना फूलते-फलते

ऐ प्यारे श्रद्धावानो !
अग्नि प्रभु ! को मानो
कर्म करो सारे याज्ञिक
श्रद्धा को विनय में ढा़लो
धर्म-कर्म में रुचि,
करो आत्मा मन शुचि
प्रभु के रहो बन के
धर्म और कर्म विहीन
ना फूलते-फलते
ध्यान-उपासना धर्म
कर्म के फल फलते